Monday, April 26, 2021

   *!! छोटी सी गलती !!*

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 एक बार एक राजा, भोजन कर रहा था, अचानक खाना परोस रहे सेवक के हाथ से थोड़ी सी सब्जी राजा के कपड़ों पर छलक गई। राजा की त्यौरियां चढ़ गयीं।


जब सेवक ने यह देखा तो वह थोड़ा घबराया, लेकिन कुछ सोचकर उसने प्याले की बची सारी सब्जी भी राजा के कपड़ों पर उड़ेल दी। अब तो राजा के क्रोध की सीमा न रही। उसने सेवक से पूछा, 'तुमने ऐसा करने का दुस्साहस कैसे किया?'


सेवक ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया, महाराज ! पहले आपका गुस्सा देखकर मैनें समझ लिया था कि अब जान नहीं बचेगी। लेकिन फिर सोचा कि लोग कहेंगे की राजा ने छोटी सी गलती पर एक बेगुनाह को मौत की सजा दी। ऐसे में आपकी बदनामी होती। तब मैनें सोचा कि सारी सब्जी ही उड़ेल दूं। ताकि दुनिया आपको बदनाम न करे और मुझे ही अपराधी समझे।


राजा को उसके जबाव में एक गंभीर संदेश के दर्शन हुए और पता चला कि सेवक भाव कितना कठिन है। जो समर्पित भाव से सेवा करता है उससे कभी गलती भी हो सकती है फिर चाहे वह सेवक हो, मित्र हो, या परिवार का कोई सदस्य, ऐसे समर्पित लोगों की गलतियों पर नाराज न होकर उनके प्रेम व समर्पण का सम्मान करना चाहिए।

   !! *स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी पूंजी हैं* !!

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एक बार की बात है एक गॉव में एक धनी व्यक्ति रहता था। उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी लेकिन वह बहुत ज़्यादा आलसी था। अपने सारे काम नौकरों से ही करता था और खुद सारे दिन सोता रहता या अययाशी करता था। वह धीरे धीरे बिल्कुल निकम्मा हो गया था| उसे ऐसा लगता जैसे मैं सबका स्वामी हूँ क्यूंकी मेरे पास बहुत धन है मैं तो कुछ भी खरीद सकता हूँ। यही सोचकर वह दिन रात सोता रहता था| लेकिन कहा जाता है की बुरी सोच का बुरा नतीज़ा होता है।


बस यही उस व्यक्ति के साथ हुआ। कुछ सालों उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका शरीर पहले से शिथिल होता जा रहा है उसे हाथ पैर हिलाने में भी तकलीफ़ होने लगी यह देखकर वह व्यक्ति बहुत परेशान हुआ। उसके पास बहुत पैसा था उसने शहर से बड़े बड़े डॉक्टर को बुलाया और खूब पैसा खर्च किया लेकिन उसका शरीर ठीक नहीं हो पाया। वह बहुत दुखी रहने लगा| एक बार उस गॉव से एक साधु गुजर रहे थे उन्होने उस व्यक्ति की बीमारी के बारे मे सुना।


सो उन्होनें सेठ के नौकर से कहा कि वह उसकी बीमारी का इलाज़ कर सकते हैं। यह सुनकर नौकर सेठ के पास गया और साधु के बारे में सब कुछ बताया। अब सेठ ने तुरंत साधु को अपने यहाँ बुलवाया लेकिन साधु ने कहा क़ि वह सेठ के पास नहीं आएँगे अगर सेठ को ठीक होना है तो वह स्वयं यहाँ चलकर आए। सेठ बहुत परेशान हो गया क्यूंकी वो असहाय था और चल फिर नहीं पता था। लेकिन जब साधु आने को तैयार नहीं हुए तो हिम्मत करके बड़ी मुश्किल से साधु से मिलने पहुचें| पर साधु वहाँ थे ही नहीं। सेठ दुखी मन से वापिस आ गया अब तो


रोजाना का यही नियम हो गया साधु रोज उसे बुलाते लेकिन जब सेठ आता तो कोई मिलता ही नहीं था। ऐसे करते करते 3 महीने गुजर गये। अब सेठ को लगने लगा जैसे वह ठीक होता जा रहा है उसके हाथ पैर धीरे धीरे कम करने लगे हैं। अब सेठ की समझ में सारी बात आ गयी की साधु रोज उससे क्यूँ नहीं मिलते थे। लगातार 3 महीने चलने से उसका शरीर काफ़ी ठीक हो गया था। तब साधु ने सेठ को बताया की बेटा जीवन में कितना भी धन कमा लो लेकिन स्वस्थ शरीर से बड़ा कोई धन नहीं होता | 


*शिक्षा*:-

तो मित्रों, यही बात हमारे दैनिक जीवन पर भी लागू होती है पैसा कितना भी कमा लो लेकिन स्वस्थ शरीर से बढ़कर कोई पूंजी नहीं होती।

 


                    *!! अंतिम महल !!*

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 एक राजा बहुत ही महत्त्वाकांक्षी था और उसे महल बनाने की बड़ी महत्त्वाकांक्षा रहती थी। उसने अनेक महलों का निर्माण करवाया! रानी उनकी इस इच्छा से बड़ी व्यथित रहती थी कि पता नहीं क्या करेंगे इतने महल बनवाकर!


एक दिन राजा नदी के उस पार एक महात्मा जी के आश्रम के वहाँ से गुजर रहे थे तो वहाँ एक संत की समाधी थी। सैनिकों से राजा को सूचना मिली कि संत के पास कोई अनमोल खजाना था। उसकी सूचना उन्होंने किसी को न दी पर अंतिम समय में उसकी जानकारी एक पत्थर पर खुदवाकर अपने साथ ज़मीन में गढ़वा दिया और कहा कि जिसे भी वो खजाना चाहिये उसे अपने स्वयं के हाथों से अकेले ही इस समाधी से, चोरासी हाथ नीचे सूचना पड़ी है, निकाल लें और अनमोल सूचना प्राप्त कर लेंवे और ध्यान रखें उसे बिना कुछ खाये पिये खोदना है और बिना किसी की सहायता के खोदना है अन्यथा सारी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी !


राजा अगले दिन अकेले ही आया और अपने हाथों से खोदने लगा। बड़ी मेहनत के बाद उसे वो शिलालेख मिला और उन शब्दों को जब राजा ने पढ़ा तो उसके होश उड़ गये और सारी अकल ठिकाने आ गई!


उस पर लिखा था- हे राहगीर! संसार के सबसे भूखे प्राणी शायद तुम ही हो और आज मुझे तुम्हारी इस दशा पर बड़ी हँसी आ रही है। तुम कितने भी महल बना लो पर तुम्हारा अंतिम महल यही है। एक दिन तुम्हें इसी मिट्टी में मिलना है!


सावधान राहगीर, जब तक तुम मिट्टी के ऊपर हो तब तक आगे की यात्रा के लिये तुम कुछ जतन कर लेना क्योंकि जब मिट्टी तुम्हारे ऊपर आयेगी तो फिर तुम कुछ भी न कर पाओगे यदि तुमने आगे की यात्रा के लिये कुछ जतन न किया तो अच्छी तरह से ध्यान रखना की जैसे ये चोरासी हाथ का कुआं तुमने अकेले खोदा है बस वैसे ही आगे की चोरासी लाख योनियों में तुम्हें अकेले ही भटकना है। हे राहगीर! ये कभी न भूलना कि "मुझे भी एक दिन इसी मिट्टी में मिलना है, बस तरीका अलग-अलग है।"


फिर राजा जैसै-तैसे कर के उस कुएँ से बाहर आया और अपने राजमहल गया, पर उस शिलालेख के उन शब्दों ने उसे झकझोर के रख दिया और सारे महल जनता को दे दिये और "अंतिम घर" की तैयारियों मे जुट गया!


*शिक्षा:-*

 हमें एक बात हमेशा याद रखना चाहिए कि इस मिट्टी ने जब रावण जैसै सत्ताधारियों को नहीं बक्सा तो फिर साधारण मानव क्या चीज है। इसलिये ये हमेशा याद रखना चाहिए कि मुझे भी एक दिन इसी मिट्टी में मिलना है, क्योंकि ये मिट्टी किसी को नहीं छोड़ने वाली है।

   !! *लालच का फल* !!

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हल्द्वानी एक छोटा सा शहर था। उसी शहर में गणेश मिठाईवाले की एक बड़ी प्रसिद्ध दुकान थी । वह बहुत ही स्वादिष्ट बाल मिठाई बनाया करता था। धीरे-धीरे गणेश मिठाईवाले की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। अधिकतर लोग गणेश की दुकान से मिठाइयां खरीदने लगे ।आमदनी बढ़ते ही मिठाई वाले का दिमाग सातवें आसमान में पहुंच गया। ज्यादा मुनाफा पाने के चक्कर में अब वह नापतोल में भी गड़बड़ करने लगा । एक दिन एक चतुर ग्राहक उसकी दुकान पर आया। उसने मिठाई वाले से मिठाई मांगीं। गणेश मिठाई तोलते वक्त उसमें भी हाथ की सफाई दिखाने लगा। लेकिन ग्राहक चतुर था। 


उसने तुरंत बोला “जरा ठीक से तोलो भाई। मिठाई की तोल में गड़बड़ी दिखाई देती है”। गणेश बोला “सेठजी चिंता की क्या बात है।अगर तोल में थोड़ा गड़बड़ भी हो गई तो कोई बात नहीं, आपको थोड़ा वजन कम उठाना पड़ेगा। जिससे आपको तकलीफ भी कम होगी”। गणेश की बात सुनकर ग्राहक ने उसकी अक्ल ठिकाने लगाने का निश्चय किया। उसने गणेश से मिठाई का डिब्बा ले लिया ।लेकिन रुपए देते वक्त उसने दाम से कुछ कम रुपए गणेश के हाथ में थमा दिए ।


गणेश ने उन रुपयों को गिना तो उसने पाया कि रुपए मिठाई के दाम से कुछ कम है। उसने ग्राहक की तरफ देखा । इस पर ग्राहक ने गणेश से कहा “हां , मैंने जानबूझकर तुमको रुपए कुछ कम दिए हैं ताकि तुम्हें रुपए गिनने में कम परेशानी हो। जिस तरह तुमने मेरा भला सोचा कि मुझे मिठाई के डिब्बे का वजन उठाने में कम तकलीफ हो।उसी तरह मैंने भी तुम्हारी तकलीफ को कुछ कम करने का सोचा ।इसीलिए पैसे कम दिए”।


यह कह कर ग्राहक जोर-जोर से हंसने लगा।उस वक्त तक वहां पर कई लोग जमा हो गए। तब ग्राहक ने लोगों को सारी घटना सुनाई।  घटना सुनते ही वहां पर उपस्थित सभी लोग जोर जोर से हंसने लगे। लेकिन मिठाई वाले को तो काटो तो खून नहीं ।उसे अपने ही चालाकी भारी पड़ गई । लेकिन ग्राहक वहां से मुस्कुराता हुआ चला गया।इसके बाद कभी भी गणेश ने मिठाई की तोल में गड़बड़ ना करने का फैसला कर लिया।



*Moral Of The Story*


लालच का फल हमेशा ही बुरा होता हैं। इसीलिए हमें सदैव लालच से बचना चाहिए।

         *!! जीने की कला !!*     

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एक शाम माँ ने दिनभर की लम्बी थकान एवं काम के बाद जब डीनर बनाया तो उन्होंने पापा के सामने एक प्लेट सब्जी और एक जली हुई रोटी परोसी। मुझे लग रहा था कि इस जली हुई रोटी पर कोई कुछ कहेगा। परन्तु पापा ने उस रोटी को आराम से खा लिया परन्तु मैंने माँ को पापा से उस जली रोटी के लिए "साॅरी" बोलते हुए जरूर सुना था। और मैं ये कभी नहीं भूल सकता जो पापा ने कहा "प्रिये, मुझे जली हुई कड़क रोटी बेहद पसंद है।"

देर रात को मैने पापा से पूछा, क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद है?

उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लेते हुए कहा - तुम्हारी माँ ने आज दिनभर ढ़ेर सारा काम किया, और वो सचमुच बहुत थकी हुई थी। और...वैसे भी...एक जली रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती परन्तु कठोर-कटू शब्द जरूर पहुंचाते हैं।

तुम्हें पता है बेटा - जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से...अपूर्ण लोगों से... कमियों से...दोषों से...मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूँ और शायद ही किसी काम में ठीक हूँ। 

मैंने इतने सालों में सीखा है कि-

"एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करों...अनदेखी करों... और चूनो... पसंद करो...आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना।"


     मित्रों, जिदंगी बहुत छोटी है...उसे हर सुबह दु:ख...पछतावे...खेद के साथ जागते हुए बर्बाद न करें। जो लोग तुमसे अच्छा व्यवहार करते हैं, उन्हें प्यार करों ओर जो नहीं करते उनके लिए दया सहानुभूति रखो।


किसी ने क्या खूब कहा है-

  "मेरे पास वक्त नहीं उन लोगों से नफरत करने का जो मुझे पसंद नहीं करते,

क्योंकि मैं व्यस्त हूँ उन लोगों को प्यार करने में जो मुझे पसंद करते हैं।"


  तो मित्रों, जिदंगी का आनंद लीजिये...उसका लुत्फ़ उठाइए...उसकी समाप्ति... उसका अंत तो निश्चित है......। अतः आप सब स्वस्थ रहें, सुखी रहें एवं समृद्ध रहें, साथ ही अपने काम में व्यस्त रहें एवं मस्त रहें।

  *!! काबिलियत की पहचान !!*
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किसी  जंगल  में  एक  बहुत  बड़ा  तालाब  था . तालाब  के   पास  एक बागीचा  था , जिसमे  अनेक  प्रकार  के पेड़  पौधे  लगे थे . दूर- दूर  से  लोग  वहाँ  आते  और बागीचे  की  तारीफ  करते। गुलाब के पेड़ पे लगा पत्ता हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता की हो सकता है एक दिन कोई  उसकी भी तारीफ करे. पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा . उसके अन्दर तरह-तरह के विचार आने लगे—” सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते  पर मुझे कोई देखता तक नहीं। 
शायद  मेरा जीवन किसी काम का नहीं …कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं… ” और ऐसे विचार सोच कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा. दिन यूँही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आंधी का रूप ले लिया.  बागीचे के पेड़-पौधे तहस-नहस होने लगे , देखते-देखते सभी फूल ज़मीन पर गिर कर निढाल हो गए , पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा. पत्ते ने देखा कि  उससे कुछ ही दूर पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंको की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी. चींटी  प्रयास करते-करते  काफी  थक  चुकी  थी और  उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी कि  तभी पत्ते ने उसे आवाज़ दी, ” घबराओ नहीं।
आओ , मैं  तुम्हारी  मदद  कर  देता  हूँ .”, और ऐसा कहते हुए अपनी उपर बैठा लिया. आंधी रुकते-रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया; चींटी किनारे पर पहुँच कर बहुत खुश हो गयी और  बोली, ”  आपने आज मेरी जान बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है , सचमुच आप महान हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ! “ यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला,” धन्यवाद तो मुझे  करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ , जिससे मैं आज तक अनजान था.  आज पहली बार मैंने अपने  जीवन  के  मकसद और  अपनी  ताकत  को पहचान  पाया हूँ … .’

शिक्षा:-
मित्रों, ईश्वर  ने हम सभी को अनोखी शक्तियां दी हैं ; कई बार हम खुद अपनी काबिलियत से अनजान होते हैं और समय आने पर हमें इसका पता चलता है, हमें इस बात को समझना चाहिए कि   किसी  एक  काम  में  असफल  होने  का  मतलब  हमेशा   के  लिए  अयोग्य  होना  नही  है. खुद  की  काबिलियत  को  पहचान कर  आप  वह  काम   कर  सकते  हैं, जो  आज  तक  किसी  ने  नही  किया  है।

 *सच्ची सेवा - भावना!*


*एक संत ने एक विश्व-विद्यालय आरंभ किया। इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य था ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण जो समाज के विकास में सहभागी बन सकें।*


*एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसका विषय था - "जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा।"*


*निर्धारित तिथि को तयशुदा वक्त पर विद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रतियोगिता आरंभ हुई। किसी छात्र ने सेवा के लिए संसाधनों की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि हम दूसरों की तभी सेवा कर सकते हैं जब हमारे पास उसके लिए पर्याप्त संसाधन हों। वहीं कुछ छात्रों की यह भी राय थी कि सेवा के लिए संसाधन नहीं, भावना का होना जरूरी है।*


*इस तरह तमाम प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में शानदार भाषण दिए। आखिर में जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे विद्यार्थी को चुना, जो मंच पर बोलने के लिए ही नहीं आया था।*


*यह देखकर अन्य विद्यार्थियों और कुछ शैक्षिक सदस्यों में रोष के स्वर उठने लगे। संत ने सबको शांत कराते हुए बोले, 'प्यारे मित्रो व विद्यार्थियो, आप सबको शिकायत है कि मैंने ऐसे विद्यार्थी को क्यों चुना, जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था। दरअसल, मैं जानना चाहता था कि हमारे विद्यार्थियों में कौन सेवाभाव को सबसे बेहतर ढंग से समझता है।*


*इसीलिए मैंने प्रतियोगिता स्थल के द्वार पर एक घायल बिल्ली को रख दिया था। आप सब उसी द्वार से अंदर आए, पर किसी ने भी उस बिल्ली की ओर आंख उठाकर नहीं देखा। यह अकेला प्रतिभागी था, जिसने वहां रुक कर उसका उपचार किया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया। सेवा-सहायता डिबेट का विषय नहीं, जीवन जीने की कला है।*



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*जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसके वक्तव्य कितने भी प्रभावी क्यों न हों, वह पुरस्कार पाने के योग्य नहीं है।'*

  *!! जीने के लिए विश्वास काफी है !!*
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जाड़े का दिन था और शाम होने आयी। आसमान में बादल छाये थे। एक नीम के पेड़ पर बहुत से कौए बैठे थे। वे सब बार बार काँव-काँव कर रहे थे और एक दूसरे से झगड़ भी रहे थे। इसी समय एक मैना आयी और उसी पेड़ की एक डाल पर बैठ गई। मैना को देखते ही कई कौए उस पर टूट पड़े।
बेचारी मैना ने कहा- बादल बहुत है इसीलिये आज अँधेरा हो गया है। मैं अपना घोंसला भूल गयी हूँ। इसीलिये आज रात मुझे यहाँ बैठने दो।
कौओं ने कहा- नहीं यह पेड़ हमारा है तू यहाँ से भाग जा। मैना बोली- पेड़ तो सब ईश्वर के बनाये हुए हैं।
इस सर्दी में यदि वर्षा पड़ी और ओले पड़े तो ईश्वर ही हमें बचा सकते हैं। मैं बहुत छोटी हूँ तुम्हारी बहिन हूँ, तुम लोग मुझ पर दया करो और मुझे भी यहाँ बैठने दो।
कौओं ने कहा हमें तेरी जैसी बहिन नहीं चाहिये। तू बहुत ईश्वर का नाम लेती है तो ईश्वर के भरोसे यहाँ से चली क्यों नहीं जाती। तू नहीं जायेगी तो हम सब तुझे मारेंगे।
कौए तो झगड़ालू होते ही है, वे शाम को जब पेड़ पर बैठने लगते हैं तो उनसे आपस में झगड़ा किये बिना नहीं रहा जाता। वे एक दूसरे को मारते हैं और काँव काँव करके झगड़ते रहते हैं।
कौन कौआ किस टहनी पर रात को बैठेगा, यह कोई झटपट तय नहीं हो जाता। उनमें बार बार लड़ाई होती है, फिर किसी दूसरी चिड़िया को वह पेड़ पर कैसे बैठने दे सकते हैं! आपसी लड़ाई छोड़ कर वे मैना को मारने दौड़े।
कौओं को काँव काँव करके अपनी ओर झपटते देखकर बेचारी मैना वहाँ से उड़ गयी और थोड़ी दूर जाकर एक आम के पेड़ पर बैठ गयी।
रात को आँधी आयी, बादल गरजे और बड़े बड़े ओले बरसने लगे। बड़े आलू जैसे ओले तड़-भड़ बंदूक की गोली जैसे गिर रहे थे। कौए काँव काँव करके चिल्लाये। इधर से उधर थोड़ा बहुत उड़े परन्तु ओलो की मार से सब के सब घायल होकर जमीन पर गिर पड़े। बहुत से कौए मर गये।
मैना जिस आम पर बैठी थी उसकी एक डाली टूट कर गिर गयी। डाल भीतर से सड़ गई थी और पोली हो गई थी। डाल टूटने पर उसकी जड़ के पास पेड़ में एक खोंडर हो गया। छोटी मैना उसमें घुस गयी और उसे एक भी ओला नहीं लगा।
सबेरा हुआ और दो घड़ी चढने पर चमकीली धूप निकली। मैना खोंडर में से निकली पंख फैला कर चहक कर उसने भगवान को प्रणाम किया और उड़ी।
पृथ्वी पर ओले से घायल पड़े हुए कौए ने मैना को उड़ते देख कर बड़े कष्ट से पूछा- मैना बहिन तुम कहाँ रही तुमको ओलो की मार से किसने बचाया।
मैना बोली मैं आम के पेड़ पर अकेली बैठी थी और भगवान की प्रार्थना करती थी। दुःख में पड़े असहाय जीव को ईश्वर के सिवा कौन बचा सकता है!!
 *चन्दन का बाग*
*एक राजा जो बहुत परोपकारी थे, उनके पास बहुत ही सुन्दर और विशाल चन्दन का बाग था जिससे हर वर्ष उनको सहस्त्रों रूपये का चन्दन अन्य  देशावरों को जाता जिससे तेल और इत्र तैयार किये जाते थे..*
*एक रोज, राजा उनके सैनिकों के साथ घोड़ों पर सवार होकर अपने प्रजाजन का हाल जानने के उद्देश्य से अपने महल से निकले. लौटते समय बहुत अँधेरे होने के कारण वो मार्ग से भटक गए और एक घने जंगल में जा पहुँचे. उन्होंने जंगल में एक भील और उनकी पत्नी को झोपड़ी बनाये रहते हुए देखा.*
*राजा को अपने समीप देखकर भील ने बड़े ही स्नेह पूर्वक उनका आदर सत्कार किया, और सभी सैनिकों और राजा के लिए जल, आसन, फल, कंद-मूल का प्रबंध किया.. राजा ने बहुत सुखपूर्वक रात्रि वहाँ बिताई.*
*प्रातः काल जब राजा जाने के लिए तैयार हुए तब उन्होंने भील से पुछा- “तुम अपनी जीविका यहाँ किस प्रकार से चलाते हो?” भील ने कहा- “महाराज, मैं रोज वन से लकड़ी काटता हूँ और उसका कोयला तैयार करता हूँ, उसी को बाद में बेचकर अपना जीवन निर्वाह करता हूँ..”*
*राजा ने कहा- “हम तुमसे बहुत बहुत ही ज्यादा प्रसन्न हैं! यदि तुम हमारे नगर में चलकर रहो तो हमें बहुत प्रसन्नता होगी..” भील ने कहा- “महाराज! मुझे नगर का माहौल पसंद नहीं है, वन जीवन ही मुझे ज्यादा आनंददायी प्रतीत होता है..”*
*राजा ने कहा- “ठीक है! हम अपना बहुत बड़ा चन्दन का बाग तुमको देते हैं, वहीँ जाकर तुम अपना जीवन निर्वाह करो, ये तुम्हारे लिए बहुत अच्छा रहेगा.. और यदि तुमने अच्छे ढंग से मेहनत की तो तुम्हारा वंश-वन्शांतर उसी बगिया से सुखपूर्वक अपना जीवन निर्वाह करता रहेगा..” भील का खुशी का ठिकाना न था.. राजा की इस उदारता की सराहना करते हुए वह चन्दन के बाग को चल दिया और वहीँ पर अपनी कुटिया बनाकर रहने लगा..*
*भील को चन्दन के बाग में रहते हुए एक वर्ष हो चुके थे. राजा ने सोचा क्यों न आज चन्दन के बाग की सैर कर आऊँ! और अपने कृपापात्र भील को वहाँ देखूं, अब तो वह बड़ा ही अमीर हो गया होगा. हजारों रूपये साल की आमदनी पाकर अब तो वह बड़े ही ठाट बाट से रहता होगा.*
*राजा चंदन की बाग पर पहुंचकर देखते क्या हैं कि पूरा चन्दन का बाग उजड़ चूका है और कुछ  ही  पेड़बचे हुए हैं बाकि सब तरफ कोयला  का खदान बन चूका है… राजा को भील से ऐसी उम्मीद नहीं थी, वो यह दृश्य देखकर बहुत दुखी हुए.. उन्होंने थोड़ा आगे बढ़कर भील से पुछा- “यहाँ यह क्या कर दिया तुमने? बगिया कैसे उजड़ गई? और तुम्हारी दशा क्या है?”*
*भील बोला- “महाराज! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे यह बाग दिया, पहले मुझको वन में जाकर लकड़ी काटने पड़ते और कोयले बनाकर कोशों चलकर आता था.. लेकिन अब यहाँ पास ही लकड़ी काट लेता हूँ, और कोयला बनाकर नगर में बेच  आता हूँ परन्तु अब दो पेड़ ही शेष बचे हैं कृपया कोई दूसरी वाटिका हमें बताइए जिससे वहाँ जाकर मैं डेरा लगा सकूं!”*
*इतना सुनते ही राजा क्रोध से  काँपने लगा और भील की मूर्खता पर बहुत ही ज्यादा दुखी हुआ.. राजा ने भील से कहा- “अरे मुर्ख! तुमने इस लाखों की संपत्ति का नाश कर दिया और अब दूसरी वाटिका की उम्मीद करते हो! तू जा और उसी जंगल में अपना जीवन यापन कर!”*
*भील बोला- “क्यों, क्या हुआ महाराज? मैंने क्या अपराध किया है? लकड़ियों को कोयले के सिवाय और किस कार्य में लाया जा सकता है?”*
*राजा ने कहा- “अच्छा! जाओ इस बचे हुए वृक्ष में से एक छोटी-सी लकड़ी काट लो और इसे बाजार में पंसारी के यहाँ बेच आओ!” भील बाजार में पहुंचा और पंसारी को एक छोटी-सी लकड़ी का टुकड़ा दिया. पंसारी ने लकड़ी के उचित दाम दिए… अब भील अपने पिछले किये हुए काम पर बहुत ज्यादा पछताने लगा. आज जरा-सी लकड़ी ने उसे एक दिन की पूरी कमाई उसके हाथ में रख दी थी और उसका समय भी बचा था!*
*भील रोनी सूरत लिए राजा के पास गया और उनके चरणों में गिरकर कहने लगा- “महाराज! कृपया मुझे क्षमा करें, मैंने स्वयं का नाश कर डाला.. अब क्या करूँ कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिये!”*
*राजा को उसके विलाप पर दया आ गई और उसने कहा- “ठीक है! तुमने जो मूर्खता की है उसे अब सुधार लो, बचे हुए वृक्षों से और वृक्ष बढाओ, खर्च के लिए थोड़ा-सा काट लिया करो और इसके ज्यादा पेड़ लगाते रहो थोड़े ही दिनों में फिर चन्दन की बगिया तैयार हो जायेगी…*

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*प्रिय दोस्तों, हम सबकी Life उस चन्दन बाग की तरह है और हमारी सांसें चन्दन के वृक्ष के समान हैं लेकिन बड़ी दुःख की बात है कि हम अपने लाइफ को अपने कीमत से बहुत कम आँक रहे हैं, हम सबके अंदर चंदन रुपी एक Quality है लेकिन हम सब इसे एक सामान्य लकड़ी Means एक सामान्य जीवन के रूप में ही जीने को तैयार हो रहे हैं.. जबकि हम सबको पता है कि हमारे अंदर अदभुत टैलेंट हैं लेकिन हम क्यों अपने सपने को मार रहे हैं, हम क्यों अपनी वैल्यू नहीं समझ रहे हैं.. हमें दोबारा मनुष्य रुपी चंदन का बाग नसीब नहीं होने वाला इसलिए हम
  *!! क्रोध पर विजय !!*
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बहुत प्राचीन समय की बात है। किसी गाँव में एक बुर्जुग महात्मा रहते थे। दूर-दूर से लोग शिक्षा गृहण करने के उद्देश्य से अपने बच्चों को उनके आश्रम में भेजते थे। एक दिन महात्मा जी के पास कमल नाम का एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आया। ‘गुरु जी मुझे अपने श्रीचरणों में जगह दे दीजिए। अब मेरी कोई कामना बाकी नहीं रही है। मैं आश्रम में रहकर आपके आज्ञानुसार समाज को अभी तक प्राप्त किया हुआ ज्ञान वितरित करना चाहता हूँ।’
पारखी वृद्ध महात्मा ने एकदम समझ लिया कि यह व्यक्ति काबिल है, इसकी कामना सच्ची है और यह समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने के लिए कृतसंकल्पित है। कमल उनके चरणों में गिरकर प्रार्थना किये जा रहा था-गुरु जी! मुझे अपने श्रीचरणों में स्थान दें। महात्मा जी ने कहा-‘पुत्र! आश्रम की परम्परा है कि तुम स्नान करके पवित्र हो और भगवान के आगे संकल्प धारण करो कि अपना कर्त्तव्य सही तरीके से निभाओगे। अतः इस कार्य के लिए तुम कल प्रातः स्नान करके आश्रम आ जाना।’
 
उसके जाते ही वृद्ध महात्मा जी ने साफ-सफाई का कार्य करने वाली महिला को अपने पास बुलाया। ‘कल सुबह यह नया शिक्षक आयेगा। जैसे ही यह आश्रम के नजदीक आये, तुम इस प्रकार से झाड़ू लगाना कि उसके चेहरे पर धूल गिर जाए। लेकिन यह कार्य थोड़ा सावधानी से करना। वह तुम पर हाथ भी छोड़ सकता है।’
महिला महात्मा जी की बहुत सम्मान करती थी। उसने उनकी आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। अति प्रसन्न मुद्रा में कमल नहा-धोकर इठलाता हुआ आश्रम आने लगा। जैसे ही वह नजदीक पहुँचा, महिला ने तेजी से झाड़ू लगाना शुरू कर दिया। बेचारे का पूरा चेहरा धूल से सन गया। उसके क्रोध की सीमा न रही। पास पड़े पत्थर को उठाकर वह महिला को मारने के लिए दौड़ा। महिला पहले ही सावधान थी। वह झाड़ू फैंक-फांक के वहाँ से भाग खड़ी हुई। अधेड़ के मुख में जो आया बकता चला गया।
कमल वापिस घर गया और दुबारा स्नान करके महात्मा के पास लौटा। महात्मा जी ने कहा- ‘अभी तो तुम जानवरों के समान लड़ने के लिए दौड़ते-चिल्लाते हो। तुमसे अभी यहाँ शिक्षण कार्य नहीं होगा। तुम एक वर्ष के बाद आना तब तक जो कार्य करते हो वही करते रहो।’ कमल की इच्छा सच्ची थी। उसकी महात्मा में श्रद्धा भी सच्ची थी। वर्ष पूरा होते ही वह फिर महात्मा जी के समीप उपस्थित हुआ।
‘पुत्र तुम कल स्नान करके प्रातः आना।’ - महात्मा जी ने आदेश दिया। कमल के जाते ही महात्मा जी ने सफाई कर्मचारी को बुला कर कहा- ‘वह फिर आ रहा है। इस बार मार्ग में झाड़ू इस तरह से लगाना कि धूल के साथ-साथ उस पर झाड़ू की हल्की सी चोट भी लग जाए। डरना मत, वह तुम्हें मारेगा नहीं। कुछ भी बोले तो चुपचाप सुनते रहना।’ अगले दिन स्नान-ध्यान करके वह व्यक्ति जैसे ही द्वार तक पहुंचा। महिला झाड़ू लगाते हुए पहुंच गयी। महिला ने आदेशानुसार जानबूझ झाड़ू उस पर इस प्रकार से छुआ कि कपड़े भी गंदे हो गये।
कमल को बहुत क्रोध आया, पर झगड़ने की बात उसके मन में नहीं आयी। वह केवल महिला को गालियाँ बक कर फिर स्नान करने घर लौट गया। जब वह महात्मा जी के पास वापिस पहुंचा, संत ने कहा-‘तुम्हारी काबिलियत में मुझे संदेह है। एक वर्ष के बाद यहाँ आना।’ एक वर्ष और बीत गया। कमल महात्मा जी के पास आया। उसे पूर्व के भांति स्नान-ध्यान करके आने की आज्ञा मिली।
महात्मा जी ने उसके जाते ही उसी महिला को फिर बुलाया- ‘इस बार सुबह जब वह आये तो तुम इस बार अपनी कचड़े की टोकरी उस पर उड़ेल देना।’ साफ-सफाई करने वाली महिला डर गयी। ‘वह तो अति कठोर स्वभाव का है। ऐसा करने पर तो वह अत्यंत क्रोधित होगा और मार-पीट पर उतर जायेगा।’-महिला ने कहा। महात्मा जी ने उसे आश्वासन दिया- ‘चिन्ता मत करो। इस बार वह कुछ नहीं कहेगा। इसलिए तुम्हें भागने की आवश्यकता नहीं है।’
 
सुबह जैसे ही कमल आश्रम पहुँचा। महिला ने अनजान बनकर पूरा कूड़ा-कचरा उस पर उड़ेल दिया। पर यह क्या! इस बार न तो वह गुस्सा हुआ और न ही मार-पीट के लिए दौड़ा। ‘माता! आप मेरी गुरु हैं।’ -कमल ने महिला के सामने अपना मस्तक झुका कर कहा। ‘आपने मुझ मूर्ख-अभिमानी पर अति कृपा की है। आपके सहयोग से मैंने अपने बड़प्पन के अहंकार और क्रोध-रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त की है।’
वह दुबारा घर गया। स्नान करके आश्रम में उपस्थित हुआ। इस बार महात्मा जी ने उसे गले लगा लिया और बोले- ‘पुत्र! तुमने अपने क्रोध पर काबू पा लिया है। अतः अब तुम आश्रम में कार्य करने के सच्चे अधिकारी हो..!!’

   !! *गलती का पश्चाताप* !!

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अध्यापक द्वारा कक्षा में गणित की परीक्षा ली गई। परीक्षा लेने से पहले उन्होंने सभी विद्यार्थियों से कहा, “जो विद्यार्थी सबसे अधिक अंक प्राप्त करेगा उसे पुरस्कार दिया जाएगा।” परीक्षा में केवल एक ही प्रश्न दिया गया। सभी विद्यार्थी उस प्रश्न को हल करने और पुरस्कार प्राप्त करने में जुट गये। लेकिन प्रश्न अत्यंत कठिन था, सरलता से हल नहीं किया जा सकता था। सभी विद्यार्थी जी जान से जुटे हुए थे। बहुत समय तक कोई भी विद्यार्थी उस प्रश्न को हल नहीं कर सका। अंत में एक बालक प्रश्न हल करके अध्यापक के सामने पहुँचा। अध्यापक महोदय ने प्रश्न और उसका हल देखा और पाया कि हल सही है।


उन्होंने इन्तजार किया कि शायद अन्य कोई विद्यार्थी भी सही हल निकाल कर ले आए, किन्तु देर तक कोई भी विद्यार्थी सही हल नहीं निकाल सका। समय पूरा हो चुका था। अध्यापक महोदय ने सही हल निकालकर लाने वाले को पुरस्कार दिया। पुरस्कार – प्राप्त विद्यार्थी नाचते गाते खुशी से झूमते अपने घर पहुँचा। दूसरे सभी विद्यार्थी हैरान थे कि यह लड़का सही हल कैसे निकाल सका, क्योंकि पढ़ने – लिखने में वह बालक मंदबुद्धि था।


अगले दिन अध्यापक महोदय ज्यों ही कक्षा में आए, त्यों ही पुरस्कार – प्राप्त विद्यार्थी लपक कर उनके चरणों से लिपट गया और फूट – फूट कर रोने लगा। सभी विद्यार्थी और अध्यापक हैरान थे कि इसे क्या हो गया है। अध्यापक ने उससे पूछा, “क्या बात हैं तुम रोते क्यों हो ? तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि पुरस्कार प्राप्त करके तुमने अच्छा विद्यार्थी होने का प्रमाण दिया है। ” वह बालक रोते हुए बोला, “आप यह पुरस्कार वापस ले लिजीए श्रीमान !” “पर क्यों ?” अध्यापक ने पूछा। “इसलिए कि मैं इस पुरस्कार का अधिकारी नहीं हूँ। मैंने पुस्तक में से देखकर, चोरी करके प्रश्न सही हल निकाला था। मैंने अपनी योग्यता से सही हल नहीं निकाला था। 


आप यह पुरस्कार वापस ले लीजिए और मेरी भूल के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए। भविष्य में मैं ऐसी गलती कभी दोबारा नहीं करूँगा, बालक ने कहा।” अध्यापक ने उसे वापस बुलाकर कहा, “सही हल तुम्हें नहीं आया, लेकिन धोखा देना भी तुम्हें नहीं आता। धोखा देना और चोरी करना तुम्हारा स्वभाव नहीं है, इसलिए कल घर जाने के बाद तुम्हारा मन दुखी रहा और तुमने सही बात कह डाली। तुमने सही हल नही निकाला मुझे इसका इसका दुःख नहीं है, पर तुमने सही बात कह डाली, उसकी मुझे बहुत खुशी है। गलती मान लेने वाले बालक बड़े होकर बड़ा नाम और काम करते है।” आगे चलकर यह बालक न्यायमूर्ति गोपाल कृष्ण गोखले के नाम से जाना गया।

 👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*
                  *!! आत्म मूल्यांकन !!*
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एक बार एक व्यक्ति कुछ पैसे निकलवाने के लिए बैंक में गया। उसने एक लाख चालीस हज़ार रुपए निकलवाए थे। उसे पता था कि कैशियर ने ग़लती से एक लाख चालीस हज़ार रुपए देने के बजाय एक लाख साठ हज़ार रुपए उसे दे दिए हैं लेकिन उसने ये आभास कराते हुए कि उसने पैसे गिने ही नहीं और कैशियर की ईमानदारी पर उसे पूरा भरोसा है चुपचाप पैसे रख लिए।
इसमें उसका कोई दोष था या नहीं लेकिन पैसे बैग में रखते ही 20,000 अतिरिक्त रुपयों को लेकर उसके मन में  उधेड़ -बुन शुरू हो गई। एक बार उसके मन में आया कि फालतू पैसे वापस लौटा दें लेकिन दूसरे ही पल उसने सोचा कि जब मैं ग़लती से किसी को अधिक पेमेंट कर देता हूँ तो मुझे कौन लौटाने आता है ???
लेकिन इंसान के अन्दर सिर्फ दिमाग ही तो नहीं होता… दिल और अंतरात्मा भी तो होती है… रह-रह कर उसके अंदर से आवाज़ आ रही थी कि तुम किसी की ग़लती से फ़ायदा उठाने से नहीं चूकते और ऊपर से बेईमान न होने का ढोंग भी करते हो। क्या यही ईमानदारी है?
उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। अचानक ही उसने बैग में से बीस हज़ार रुपए निकाले और जेब में डालकर बैंक की ओर चल दिया।
रुपए पाकर कैशियर ने चैन की सांस ली। उसने कस्टमर को अपनी जेब से हज़ार रुपए का एक नोट निकालकर उसे देते हुए कहा, ‘‘भाई साहब आपका बहुत-बहुत आभार! आज मेरी तरफ से बच्चों के लिए मिठाई ले जाना। प्लीज़ मना मत करना।”
‘‘भाई आभारी तो मैं हूँ आपका और आज मिठाई भी मैं ही आप सबको खिलाऊँगा, ’’ कस्टमर ने बोला।
कैशियर ने पूछा, ‘‘ भाई आप किस बात का आभार प्रकट कर रहे हो और किस ख़ुशी में मिठाई खिला रहे हो?’’
कस्टमर ने जवाब दिया,  ‘‘आभार इस बात का कि बीस हज़ार के चक्कर ने मुझे आत्म-मूल्यांकन का अवसर प्रदान किया। आपसे ये ग़लती न होती तो न तो मैं द्वंद्व में फँसता और न ही उससे निकल कर अपनी लोभवृत्ति पर क़ाबू पाता। यह बहुत मुश्किल काम था। घंटों के द्वंद्व के बाद ही मैं जीत पाया। इस दुर्लभ अवसर के लिए आपका आभार।”
*शिक्षा-*
मित्रों, कहाँ तो वो लोग हैं जो अपनी ईमानदारी का पुरस्कार और प्रशंसा पाने का अवसर नहीं चूकते और कहाँ वो जो औरों को पुरस्कृत करते हैं। ईमानदारी का कोई पुरस्कार नहीं होता अपितु ईमानदारी स्वयं में एक बहुत बड़ा पुरस्कार है। अपने लोभ पर क़ाबू पाना कोई सामान्य बात नहीं। ऐसे अवसर भी जीवन में सौभाग्य से ही मिलते हैं। अतः उन्हें गंवाना नहीं चाहिए अपितु उनका उत्सव मनाना चाहिए।
    !! *त्रुटियों पर विजय* !!
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अपनी बहन इलाइजा के साथ एक किशोर बालक घूमने निकला। रास्ते में एक किसान की लड़की मिली। वह सिर पर अमरूदों का टोकरा रखे हुए उन्हें बेचने बाज़ार जा रही थी। इलाइजा ने भूल से टक्कर मार दी, जिससे सब अमरूद वहीं गिरकर गन्दे हो गये। कुछ फूट गये, कुछ में कीचड़ लग गई। गरीब लड़की रो पड़ी। “अब मैं अपने माता पिता को क्या खिलाऊंगी जाकर, उन्हें कई दिन तक भूखा रहना पड़ेगा।” इस तरह अपनी दीनता व्यक्त करती हुई वह अमरूद वाली लड़की खड़ी रो रही थी। इलाइजा ने कहा- “भैया चलो भाग चलें, कोई आयेगा तो हमे मार पड़ेगी और दण्ड भी देना पड़ेगा। अभी तो यहाँ कोई देखता भी नहीं।”
बहन देख ऐसा मत कह, जब लोग ऐसा मान लेते हैं कि यहाँ कोई नहीं देख रहा, तभी तो पाप होते हैं। जहाँ मनुष्य स्वयं उपस्थित है वहाँ एकान्त कैसा? उसके अन्दर बैठी हुई आत्मा ही गिर गई तो फिर ईश्वर भले ही दण्ड न दे वह आप ही मर जाता है। गिरी हुई आत्मायें ही संसार में कष्ट भोगती हैं, इसे तू नहीं जानती, मैं जानता हूँ। इतना कहकर उस बालक ने अपनी जेब में रखे सभी तीन आने पैसे उस ग्रामीण कन्या को दिये और उससे कहा-बहन तू मेरे साथ चल। हमने गलती की है तो उसका दण्ड भी हमें सहर्ष स्वीकार करना चाहिये, तुम्हारे फलों का मूल्य घर चल कर चुका दूँगा।
तीनों घर पहुँचे, बालक ने सारी बात माँ को सुनाई। माँ ने एक तमाचा इलाइजा को जड़ा दूसरा उस लड़के को और गुस्से से बोली- “तुम लोग नाहक घूमने क्यों गये? घर खर्च के लिये पैसे नहीं, अब यह दण्ड कौन भुगते?” बच्चे ने कहा- “माता जी! देख मेरे जेब खर्च के पैसे तू इस लड़की को दे दे। मेरा दोपहर का विद्यालय का नाश्ता बन्द रहेगा, मुझे उसमें रत्ती भर भी आपत्ति नहीं है। अपनी गलती के लिये प्रायश्चित भी तो मुझे ही करना चाहिये।” माँ ने उसके डेढ़ महीने के जेब खर्च के पैसे उस लड़की को दे दिये। 
लड़की प्रसन्न होकर घर चली गई। डेढ़ महीने तक विद्यालय में उस लड़के को कुछ भी नाश्ता नहीं मिला, इसमें उसने जरा भी अप्रसन्नता प्रकट नहीं की। अपनी मानसिक त्रुटियों पर इतनी गम्भीरता से विजय पाने वाला यही बालक आगे चलकर विश्व विजेता नैपोलियन बोनापार्ट के नाम से विश्व विख्यात हुआ।

*शिक्षा*:- उपर्युक्त प्रसङ्ग से हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि किसी भी दीन-हीन, निर्बल, असहाय, गरीबों को वेबजह बिना काम सताना/परेशान नहीं करना चाहिए। उनकी दुर्बलता का फायदा नहीं उठाना चाहिए। साथ ही अपने किये हुए का प्रायश्चित भी स्वयं को ही अपनी गलती की सजा मानकर स्वीकार करना चाहिए

          *!! पहनावा !!*

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एक महिला को सब्जी मंडी जाना था। उसने जूट का बैग लिया और सड़क के किनारे सब्जी मंडी की और चल पड़ी। तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने आवाज़ दी: "कहाँ जायेंगी माता जी...?'' महिला ने ''नहीं भैय्या'' कहा तो ऑटो वाला आगे निकल गया।


अगले दिन महिला अपनी बिटिया मानवी को स्कूल बस में बैठाकर घर लौट रही थी। तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने आवाज़ दी: "बहन जी चन्द्रनगर जाना है क्या...?" महिला ने मना कर दिया।


पास से गुजरते उस ऑटोवाले को देखकर महिला पहचान गई कि ये कल वाला ही ऑटो वाला था। आज महिला को अपनी सहेली के घर जाना था। वह सड़क किनारे खड़ी होकर ऑटो की प्रतीक्षा करने लगी। तभी एक ऑटो आकर रुका: ''कहाँ जाएंगी मैडम...?'' महिला ने देखा ये वो ही ऑटोवाला है जो कई बार इधर से गुज़रते हुए उससे पूछता रहता है चलने के लिए। महिला बोली: ''मधुबन कॉलोनी है ना सिविल लाइन्स में, वहीं जाना है, चलोगे...?''


ऑटोवाला मुस्कुराते हुए बोला: ''चलेंगें क्यों नहीं मैडम, आ जाइये...!" ऑटो वाले के ये कहते ही महिला ऑटो में बैठ गयी। ऑटो स्टार्ट होते ही महिला ने जिज्ञासावश उस ऑटोवाले से पूछ ही लिया: ''भैय्या एक बात बताइये...? दो-तीन दिन पहले आप मुझे माताजी कहकर चलने के लिए पूछ रहे थे, कल बहन जी और आज मैडम, ऐसा क्यूँ...?'' ऑटोवाला थोड़ा झिझककर शरमाते हुए बोला: ''जी सच बताऊँ... आप चाहे जो भी समझें पर किसी का भी पहनावा हमारी सोच पर असर डालता है।


आप दो-तीन दिन पहले साड़ी में थीं तो एकाएक मन में आदर के भाव जागे, क्योंकि मेरी माँ हमेशा साड़ी ही पहनती है। इसीलिए मुँह से स्वयं ही "माता जी" निकल गया। कल आप सलवार-कुर्तें में थीं, जो मेरी बहन भी पहनती है। इसीलिए आपके प्रति स्नेह का भाव मन में जागा और मैंने ''बहन जी'' कहकर आपको आवाज़ दे दी। आज आप जीन्स-टॉप में हैं और इस लिबास में माँ या बहन के भाव तो नहीं जागते। इसीलिए मैंने आपको "मैडम" कहकर पुकारा।


*शिक्षा :-*

इस प्रसंग से हमें यह सीख मिलती है कि हमारे परिधान (वस्त्र) न केवल हमारे विचारों पर वरन दूसरे के भावों को भी बहुत प्रभावित करते हैं।

        *!! मित्रता की परिभाषा !!*

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एक बेटे के अनेक मित्र थे, जिसका उसे बहुत घमंड था। उसके पिता का एक ही मित्र था, लेकिन था सच्चा।


एक दिन पिता ने बेटे को बोला कि तेरे बहुत सारे दोस्त हैं, उनमें से आज रात तेरे सबसे अच्छे दोस्त की परीक्षा लेते हैं।


बेटा सहर्ष तैयार हो गया। रात को 2 बजे दोनों, बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे। बेटे ने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा नहीं खुला, बार-बार दरवाजा ठोकने के बाद दोनों ने सुना कि अंदर से बेटे का दोस्त अपनी माताजी को कह रहा था कि माँ कह दे, मैं घर पर नहीं हूँ। यह सुनकर बेटा उदास हो गया, अतः निराश होकर दोनों घर लौट आए।


फिर पिता ने कहा कि बेटे, आज तुझे मेरे दोस्त से मिलवाता हूँ। दोनों रात के 2 बजे पिता के दोस्त के घर पहुंचे। पिता ने अपने मित्र को आवाज लगाई। उधर से जवाब आया कि ठहरना मित्र, दो मिनट में दरवाजा खोलता हूँ।


जब दरवाजा खुला तो पिता के दोस्त के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी। पिता ने पूछा, यह क्या है मित्र।


तब मित्र बोला... अगर मेरे मित्र ने दो बजे रात्रि को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर वह मुसीबत में होगा और अक्सर मुसीबत दो प्रकार की होती है, या तो रुपये पैसे की या किसी से विवाद हो गया हो। अगर तुम्हें रुपये की आवश्यकता हो तो ये रुपये की थैली ले जाओ और किसी से झगड़ा हो गया हो तो ये तलवार लेकर मैं तुम्हारें साथ चलता हूँ।


तब पिता की आँखे भर आई और उन्होंने अपने मित्र से कहा कि, मित्र मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं, मैं तो बस मेरे बेटे को *मित्रता की परिभाषा* समझा रहा था। ऐसे मित्र न चुने जो खुदगर्ज हो और आपके काम पड़ने पर बहाने बनाने लगे!


*शिक्षा:-*

मित्र कम चुनें, लेकिन नेक चुनें..!!


 👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*


            *!! सच्चाई की जीत !!*

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एक गाँव था जिसका नाम मायापुर था। और गाँव की सुंदरता का तो कुछ कहना ही नहीं था। क्योंकि उस गांव के किनारे ही एक विशाल जंगल था और उस जंगल में कई तरह के जंगली जानवर पशु-पक्षी रहा करते थे। एक दिन की बात है की एक लकड़हारा लकड़ियों को लेकर जंगल के रास्ते से अपने गांव की और जा रहा होता है।  तभी उसे अचानक एक रास्ते पर शेर मिल जाता है और उस लकड़हारे से कहता है। देखो भाई आज मुझे कोई भी शिकार सुबह से नहीं मिला है और मुझे बहुत तेज भूख लगी है। में तुम्हे खाना चाहता हूँ और तुम्हे खा कर में अपनी भूख मिटाऊंगा। 


तभी लकड़हारा घबराकर कहता है ठीक है अगर मुझे खाने से तुम्हारी भूख मिट सकती है और तुम्हारी जान बच सकती है तो मुझे ये मंज़ूर है। लेकिन उससे पहले में तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ शेर कहता है कहो तुम तो भैया अकेले हो और तुम्हारे कर किसी की ज़िम्मेदारी भी नहीं है परन्तु मेरे घर पर बच्चे बीवी भूख से व्याकुल हो रहे है। इस कारण मुझे यह लड़कियाँ बेचकर घर पर भोजन लेकर जाना होगा, परन्तु में तुमसे ये वादा करता हूँ की में अपने बीवी और बच्चों को भोजन देकर तुरंत तुम्हारे पास आ जाऊंगा। 


तभी शेर बड़ी तेज हँसते है और कहता है कि तुमने क्या मुझे पागल समझ रखा है। तुम्हे मेरा शिकार बनना ही पड़ेगा। तभी लकड़हारा रोता है और कहता है कृप्या मुझे जाने दो में अपना वादा नहीं तोडूंगा। शेर को उसपर दया आ जाती है और कहता है की तुम्हे सूर्य डूबने से पहले ही आना होगा। लकड़हारा कहता है ठीक है। जब लकड़हारा अपनी बीवी और बच्चों को भोजन देकर शेर के पास वापस आया तो शेर प्रसन्न होता है और कहता है। तुम्हें मार कर में कोई पाप नहीं करना चाहता। तुम ईश्वर के सच्चे भक्त हो। तभी लकडहारा शेर का धन्यवाद करता है और ख़ुशी ख़ुशी अपने घर लौट जाता है। 


*शिक्षा :-*

हमें हमेशा सच बोलना चाहिए क्योंकि सच्चाई से ही व्यक्ति को सफलता प्राप्त होती..!!

 *!! छोटा न समझें किसी भी काम को !!*

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एक बार भगवान अपने एक निर्धन भक्त से प्रसन्न होकर उसकी सहायता करने उसके घर साधु के वेश में पधारे। उनका यह भक्त जाति से चर्मकार था और निर्धन होने के बाद भी बहुत दयालु और दानी प्रवृत्ति का था। वह जब भी किसी साधु-संत को नंगे पाँव देखता तो अपने द्वारा गाँठी गई जूतियाँ या चप्पलें बिना दाम लिए उन्हें पहना देता। जब कभी भी वह किसी असहाय या भिखारी को देखता तो घर में जो कुछ मिलता, उसे दान कर देता। उसके इस आचरण की वजह से घर में अकसर फाका पड़ता था। उसकी इन्हीं आदतों से परेशान होकर उसके माँ-बाप ने उसकी शादी करके उसे अलग कर दिया, ताकि वह गृहस्थी की ज़िम्मेदारियों को समझें और अपनी आदतें सुधारें। लेकिन इसका उस पर कोई असर नहीं हुआ और वह पहले की ही तरह लोगों की सेवा करता रहा। भक्त की पत्नी भी उसे पूरा सहयोग देती थी।


ऐसे भक्त से प्रसन्न होकर ही भगवान उसके घर आए थे, ताकि वे उसे कुछ देकर उसकी निर्धनता दूर कर दें तथा भक्त और अधिक ज़रूरतमंदों की सेवा कर सके। भक्त ने द्वार पर साधु को आया देख अपने सामर्थ्य के अनुसार उनका स्वागत सत्कार किया। वापस जाते समय साधू भक्त को  पारस पत्थर देते हुए बोले- इसकी सहायता से तुम्हें अथाह धन संपत्ति मिल जायेगी और तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएँगे। तुम इसे सँभालकर रखना। इस पर भक्त बोला- फिर तो आप यह पत्थर मुझे न दें। यह मेरे किसी काम का नहीं। वैसे भी मुझे कोई कष्ट नहीं है। जूतियाँ गाँठकर मिलने वाले धन से मेरा काम चल जाता है। मेरे पास राम नाम की संपत्ति भी है, जिसके खोने का भी डर नहीं। यह सुनकर साधु वेशधारी भगवान लौट गए।


इसके बाद भक्त की सहायता करने की कोई कोशिशों में असफल रहने पर भगवान एक दिन उसके सपने में आए और बोले-प्रिय भक्त! हमें पता है कि तुम लोभी नहीं हो। तुम कर्म में विश्वास करते हो। जब तुम अपना कर्म कर रहे हो तो हमें भी अपना कर्म करने दो। इसलिए जो कुछ हम दें, उसे सहर्ष स्वीकार करो। भक्त ने ईश्वर की बात मान ली और उनके द्वारा की गई सहायता और उनकी आज्ञा से एक मंदिर बनवाया और वहाँ भगवान की मूर्ति स्थापित कर उसकी पूजा करने लगा।


एक चर्मकार द्वारा भगवान की पूजा किया जाना पंडितों को सहन नहीं हुआ। उन्होने राजा से इसकी शिकायत कर दी। राजा ने भक्त को बुलाकर जब उससे पूछा तो वह बोला-मुझे तो स्वयं भगवान ने ऐसा करने को कहा था। वैसे भी भगवान को भक्ति प्यारी होती है, जाति नहीं। उनकी नज़र में कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब बराबर हैं।


राजा बोला-क्या तुम यह साबित करके दिखा सकते हो? भक्त बोला-क्यों नहीं। मेरे मंदिर में विराजित भगवान की मूर्ति उठकर जिस किसी के भी समीप आ जाए, वही सच्चे अर्थों में उनकी पूजा का अधिकारी है। राजा तैयार हो गया। पहले पंडितों ने प्रयास किए लेकिन मूर्ति उनमें से किसी के पास नहीं आई। जब भक्त की बारी आई तो उसने एक पद पढ़ा-"देवाधिदेव आयो तुम शरना, कृपा कीजिए जान अपना जना।' इस पद के पूरा होते ही मूर्ति भक्त की गोद में आ गई। यह देख सभी को आश्चर्य हुआ। राजा और रानी ने उसे तुरंत अपना गुरु बना लिया।


इस भक्त का नाम था रविदास। जी हाँ, वही जिन्हें हम संत रविदास जी या संत रैदास जी के नाम से भी जानते हैं। जिनकी महिमा सुनकर संत पीपा जी, श्री गुरुनानकदेव जी, श्री कबीर साहिब जी, और मीरांबाई जी भी उनसे मिलने गए थे। यहाँ तक कि दिल्ली का शासक सिकंदर लोदी भी उनसे मिलने आया था। उनके द्वारा रचित पदों में से 39 को "श्री गुरुग्रन्थ साहिब' में भी शामिल किया गया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इन सबके बाद भी संत रविदास जीवन भर चमड़ा कमाने और जूते गाँठने का काम करते रहे, क्योंकि वे किसी भी काम को छोटा नहीं मानते थे। जिस काम से किसी के परिवार का भरण-पोषण होता हो, वह छोटा कैसे हो सकता है।

  !! घमंड हमारा सबसे बड़ा दुश्मन !!
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बहुत सारे लोगो को कुछ न कुछ बात का घमंड होता है। वो चाहे पैसे का हो, अपनी सुंदरता का हो या अपनी प्रतिष्ठा का हो, लेकिन होता जरूर है। घमंड से कुछ हासिल हो या ना हो ,लेकिन आपके पास जो भी है वो घमंड की वजह से चला जा सकता है जिस किसी के अंदर घमंड पनपने लगता है, उसका पतन वही से शुरू हो जाता है। आइये एक कहानी की और चलते है।
एक लड़का था, उसके पापा की इतनी बड़ी कंपनी थी की अमरीका में बैठे-बैठे, अफ्रीका की सरकार को गिरा दे। उनके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी, पैसा, सत्ता सब उनके हाथ में था। लेकिन पैसा कमाते-कमाते वो अपने बच्चे को समय नहीं दे पाए। इसके बदले में बच्चे ने अपनी मनमानी करना शुरू किया, उसको कोई कुछ कहने वाला नहीं था। जैसे-जैसे बड़ा होता चला गया, उसको लगने लगा की, उसका कोई क्या बिगड़ सकता है ?? वो अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं था। 
एक दिन वो एक बड़ी होटल में कॉफ़ी पीने के लिए गया। वहाँ पर नज़दीक से एक नौकर गुज़र रहा था। नौकर के हाथ से एक कॉफ़ी का गिलास गिर गया। उस लड़के के नज़दीक में गिलास गिरने की वजह से वो लड़का चिल्लाया, और कहा की, साले अंधे तुझे दिखाई नहीं देता ?? बेवफ़ूक कही का। न जाने कहाँ-कहाँ से चले आते है। इतना बोलते ही उसने कहा की तुम्हारे मैनेजर को बुलाओ, नौकर के बहुत मना कर ने पर भी वो नहीं माना। उतनी देर में वहां पर मैनेजर आ पहुँचता है।
मैनेजर को लड़का कहता है की मुझे तुम्हारे कर्मचारी बिलकुल पसंद नहीं आये। में ये होटल खरीद के अपने कर्मचारी रखूँगा। उसने मैनेजर को कहा की मुझे इस होटल के मालिक से बात करवाओ। मैनेजर के लाख कहने पर भी लड़का नहीं माना। उसने होटल के मालिक से बात की और कहा की मुझे तुम्हारी होटल खरीदनी है। आपको कितना पैसा चाहिए ?? होटल का मालिक उसे पहचान गया। और सोच रहा था की, अगर में उसको मेरी ये होटल नहीं बेचूंगा तो ये मेरा बिज़नेस बर्बाद कर देगा।
इसलिए होटल के मालिक ने होटल की कीमत 400 करोड़ कही। लड़के ने अपने मैनेजर को कॉल करके 800 करोड़ का चेक बनवाया। और इस तरह से उसने होटल को खरीद लिया। एक छोटी सी बात के लिए उसने इतना बड़ा हंगामा कर लिया। इस बात से साफ पता चलता है की, इसके अंदर कितना घमंड था। लेकिन एक दिन ऐसा आता है की उसके पापा की मृत्यु होती है, अब कारोबार उसके कंधो पे आ जाता है। कभी कारोबार में ध्यान नहीं देने की वजह से वो कारोबार को अच्छे से संभाल नहीं पाया।
और एक दिन एक बड़े नुकसान की वजह से ऐसी नौबत आयी की उसको अपना घर, गाड़ी सब कुछ बेच देना पड़ा। उसके घमंडी स्वभाव के कारन कोई उसकी मदद के लिए भी नहीं आया। अब न तो उसको पास खाने के लिए पैसे थे और न रहने के लिए घर था।

शिक्षा:-
जब तक आप अपने दायरे में रहकर काम करते हो तब तक कोई परेशानी नहीं है, लेकिन जिस दिन आपने उस दायरे से बाहर जाने की कोशिश की तब आप मुश्किल में आ सकते हो।


शिक्षा विभाग के समस्त आदेश, न्यूज़, रोजगार अपडेटस के लिए शिक्षा विभाग राजस्थान के सबसे बड़े, विश्वसनीय, सर्वश्रेष्ठ, प्रमाणिक व शिक्षा विभाग की समस्त न्यूज वाले शैक्षणिक समूह, के फेसबुक, ट्विटर व टेलीग्राम अकाउंट से जुड़कर अपडेट प्राप्त कर सकते हैं !

 


                  *!! चमत्कार !!*

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वर्षा का मौसम था। एक बैलगाड़ी कच्ची सड़क पर जा रही थी। यह बैलगाड़ी श्यामू की थी। वह बड़ी जल्दी में था। हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी। श्यामू वर्षा के तेज़ होने से पहले घर पहुँचना चाहता था। बैलगाड़ी में अनाज के बोरे रखे हुए थे। बोझ काफ़ी था इसलिए बैल भी ज्यादा तेज़ नहीं दौड़ पा रहे थे।


अचानक बैलगाड़ी एक ओर झुकी और रूक गई। हे भगवान, ये कौन-सी नई मुसीबत आ गई अब! श्यामू ने मन में सोचा। उसने उतरकर देखा। गाड़ी का एक पहिया गीली मिट्टी में धँस गया था। सड़क पर एक गड्ढ़ा था, जो बारिश के कारण और बड़ा हो गया था। आसपास की मिट्टी मुलायम होकर कीचड़ जैसी हो गई थी और उसी में पहिया फँस गया था। श्यामू ने बैलों को खींचा और खींचा फिर पूरी ताक़त से खींचा। बैलों ने भी पूरा ज़ोर लगाया लेकिन गाड़ी बाहर नहीं निकल पाई। श्यामू को बहुत गुस्सा आया। उसने बैलों को पीटना शुरू कर दिया। इतने बड़े दो बैल इस गाड़ी को बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं, यह बात उसे बेहद बुरी लग रही थी।


हारकर वह ज़मीन पर ही बैठ गया। उसने ईश्वर से कहा, हे ईश्वर! अब आप ही कोई चमत्कार कर दो, जिससे कि यह गाड़ी बाहर आ जाए। मैं ग्यारह रूपए प्रसाद चढ़ाऊँगा। तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी, श्यामू ! ये तू क्या कर रहा है? अरे, बैलों को पीटना छोड़ और अपने दिमाग का इस्तेमाल कर। गाड़ी में से थोड़ा बोझ कम कर। फिर थोड़े पत्थर लाकर इस गड्ढे को भर। तब बैलों को खींच। इनकी हालत तो देख। कितने थक गए हैं बेचारे! श्यामू ने चारों ओर देखा। वहाँ आस-पास कोई नहीं था। श्यामू ने वैसा ही किया, जैसा उसने सुना था। पत्थरों से गड्ढा थोड़ा भर गया और कुछ बोरे उतारने से गाड़ी हल्की हो गई। श्यामू ने बैलों को पुचकारते हुए खींचा - ज़ोर लगा के और एक झटके के साथ बैलगाड़ी बाहर आ गई। वही आवाज़ फिर सुनाई दी, देखा श्यामू, यह चमत्कार ईश्वर ने नहीं, तुमने खुद किया है। 


*शिक्षा:-*

ईश्वर भी उनकी ही मदद करते हैं, जो अपनी मदद खुद करते हैं।


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

   *🌻सोच का फर्क*


एक गरीब आदमी बड़ी मेहनत से एक - एक रूपया जोड़ कर मकान बनवाता है . उस मकान को बनवाने के लिए वह पिछले 20 वर्षों से एक - एक पैसा बचत करता है ताकि उसका परिवार छोटे से झोपड़े से निकलकर पक्के मकान में सुखी सुखी रह सके .


आखिरकार एक दिन मकान बन कर तैयार हो जाता है . तत्पश्चात पंडित से पूछ कर गृह प्रवेश के लिए शुभ तिथि निश्चित की जाती है . 


लेकिन गृहप्रवेश के 2 दिन पहले ही भूकंप आता है और उसका मकान पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है .


यह खबर जब उस आदमी को पता चलती है तो वह दौड़ा दौड़ा बाजार जाता है और मिठाई खरीद कर ले आता है . मिठाई लेकर वह घटनास्थल पर पहुंचता है जहां पर काफी लोग इकट्ठे होकर उसके के मकान गिरने पर अफसोस जाहिर कर रहे थे .


ओह बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ , कितनी मुश्किल से एक - एक पैसा जोड़कर मकान बनवाया था .


 इसी प्रकार लोग आपस में तरह तरह की बातें कर रहे थे . 


वह आदमी वहां पहुंचता है और झोले से मिठाई निकाल कर सबको बांटने लगता है . यह देखकर सभी लोग हैरान हो जाते हैं .


तभी उसका एक मित्र उससे कहता है , कहीं तुम पागल तो नहीं हो गए हो , घर गिर गया , तुम्हारी जीवन भर की कमाई बर्बाद हो गई और तुम खुश होकर मिठाई बांट रहे हो .


वह आदमी मुस्कुराते हुए कहता है , तुम इस घटना का सिर्फ नकारात्मक पक्ष ही देख रहे हो इसलिए इसका सकारात्मक पक्ष तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा है . ये तो बहुत अच्छा हुआ कि मकान आज ही गिर गया ... वरना तुम्ही सोचो अगर यह मकान 2 दिनों के बाद गिरता तो मैं , मेरी पत्नी और बच्चे सभी मारे जा सकत थे . तब  कितना बड़ा नुकसान होता . 


सत्संग प्रेमियों इस कहानी से आपको समझ में आ गया होगा सकारात्मक और नकारात्मक सोच में क्या अंतर है . 


यदि वह व्यक्ति नकारात्मक दृष्टिकोण से सोचता तो शायद वह अवसाद का शिकार हो जाता . लेकिन केवल एक सोच के फर्क ने उसके दु:ख को परिवर्तित कर दिया .


*ईश्वर जो भी करता है,अच्छा ही करता है।*

*हे मानव तू परिवर्तन से काहे को डरता है।।*


 !! *सोच बदलो, जिंदगी बदल जायेगी* !!
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एक गाँव में सूखा पड़ने की वजह से गाँव के सभी लोग बहुत परेशान थे, उनकी फसले खराब हो रही थी, बच्चे भूखे-प्यासे मर रहे थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था की इस समस्या का समाधान कैसे निकाला जाय। उसी गाँव में एक विद्वान महात्मा रहते थे। गाँव वालो ने निर्णय लिया उनके पास जाकर इस समस्या का समाधान माँगने के लिये, सब लोग महात्मा के पास गये और उन्हें अपनी सारी परेशानी विस्तार से बतायी, महात्मा ने कहा कि आप सब मुझे एक हफ्ते का समय दीजिये मैं आपको कुछ समाधान ढूँढ कर बताता हूँ।
गाँव वालो ने कहा ठीक है और महात्मा के पास से चले गये। एक हफ्ते बीत गये लेकिन साधू महात्मा कोई भी हल ढूँढ न सके और उन्होंने गाँव वालो से कहा कि अब तो आप सबकी मदद केवल ऊपर बैठा वो भगवान ही कर सकता है। अब सब भगवान की पूजा करने लगे भगवान को खुश करने के लिये, और भगवान ने उन सबकी सुन ली और उन्होंने गाँव में अपना एक दूत भेजा। गाँव में पहुँचकर दूत ने सभी गाँव वालो से कहा कि “आज रात को अगर तुम सब एक-एक लोटा दूध गाँव के पास वाले उस कुवे में बिना देखे डालोगे तो कल से तुम्हारे गाँव में घनघोर बारिश होगी और तुम्हारी सारी परेशानी दूर हो जायेगी।
इतना कहकर वो दूत वहा से चला गया। गाँव वाले बहुत खुश हुए और सब लोग उस कुवे में दूध डालने के लिये तैयार हो गये लेकिन उसी गाँव में एक कंजूस इंसान रहता था उसने सोचा कि सब लोग तो दूध डालेगें ही अगर मैं दूध की जगह एक लोटा पानी डाल देता हूँ तो किसको पता चलने वाला है। रात को कुवे में दूध डालने के बाद सारे गाँव वाले सुबह उठकर बारिश के होने का इंतेजार करने लगे लेकिन मौसम वैसा का वैसा ही दिख रहा था और बारिश के होने की थोड़ी भी संभावना नहीं दिख रही थी। 
देर तक बारिश का इंतेजार करने के बाद सब लोग उस कुवे के पास गये और जब उस कुवे में देखा तो कुवा पानी से भरा हुआ था और उस कुवे में दूध का एक बूंद भी नहीं था। सब लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे और समझ गये कि बारिश अभी तक क्यों नहीं हुई। और वो इसलिये क्योँकि उस कंजूस व्यक्ति की तरह सारे गाँव वालो ने भी यही सोचा था कि सब लोग तो दूध डालेगें ही, मेरे एक लोटा पानी डाल देने से क्या फर्क पड़ने वाला है। और इसी चक्कर में किसी ने भी कुवे में दूध का एक बूँद भी नहीं डाला और कुवे को पानी से भर दिया।

*Moral of the Story:*-
Same तरह की गलती आज कल हम अपने real life में भी करते रहते हैं, हम सब सोचते है कि हमारे एक के कुछ करने से क्या होने वाला है लेकिन हम ये भूल जाते है कि “बूंद-बूंद से सागर बनता है।“ अगर आप अपने देश, समाज, घर में कुछ बदलाव लाना चाहते हैं, कुछ बेहतर करना चाहते हैं तो खुद को बदलिये और बेहतर बनायिये बाकी सब अपने आप हो जायेगा जायेगा।

      *!! मन चंगा तो कठौती में गंगा !!*

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एक बार की बात है, एक परिवार में पति, पत्नी एवं बहू-बेटा चार प्राणी रहते थे। समय आराम से बीत रहा था। चंद वर्षो बाद सास ने गंगा स्नान करने का मन बनाया वो भी अकेले पति पत्नी। बहू बेटा को भी साथ ले जाने का मन नहीं बनाया। उधर बहू मन में सोच विचार करती है कि भगवान मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है जो मैं गंगा स्नान करने से वंचित रह रही हूँ। 


सास ससुर गंगा स्नान हेतु काशी के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगे तो बहू ने सास से कहा कि माँ आप अच्छी तरह गंगा स्नान एवं यात्रा करिएगा। इधर घर की चिंता मत करिएगा। मेरा तो अभी अशुभ कर्म का उदय है वरना में भी आपके साथ चलती। सारी तैयारी करके दोनों काशी के लिए रवाना हुए। मन ही मन बहू अपने कर्मों को कोस रही थी कि आज मेरा भी पुण्य कर्म होता तो मैं भी गंगा स्नान को जाती। खैर मन को ढांढस बंधाकर घर में रही। 


उधर सास जब गंगाजी में स्नान कर रही थी। स्नान करते करते घर में रखी अलमारी की तरफ ध्यान गया और मन ही मन सोचने लगी कि अरे अलमारी खुली छोडकर आ गई, कैसी बेवकूफ औरत हूँ बंद करके नहीं आई। पीछे से बहू सारा गहना निकाल लेगी। यही विचार करते करते स्नान कर रही थी कि अचानक हाथ में पहनी हुई अँगूठी हाथ से निकल कर गंगा में गिर गई। अब और चिंता बढ़ गई कि मेरी अँगूठी गिर गई। उसका ध्यान गंगा स्नान में न होकर सिर्फ घर की अलमारी में था। 


उधर बहू ने विचार किया कि देखो मेरा शुभ कर्म होता तो मैं भी गंगा जी जाती। सासु माँ कितनी पुण्यवान है जो आज गंगा स्नान कर रही है। ये विचार करते करते एक कठौती लेकर आई और उसको पानी से भर दिया और सोचने लगी सासु माँ वहाँ गंगा स्नान कर रही है और मैं यहाँ कठौती में ही गंगा स्नान कर लूँ। 


यह विचार करके ज्योंही कठौती में बैठी तो उसके हाथ में सासु माँ के हाथ की अँगूठी आ गई और विचार करने लगी ये अँगूठी यहाँ कैसे आई ये तो सासु माँ पहन कर गई थी। इतना सब करने के बाद उसने उस अँगूठी को अपनी अलमारी में सुरक्षित रख दी और कहा कि सासु माँ आने पर उनको दे दूँगी। 


उधर सारी यात्रा एवं गंगा स्नान करके सास लौटी तब बहू ने उनकी कुशल यात्रा एवं गंगा स्नान के बारे में पूछा... तो सास ने कहा कि बहू सारी यात्रा एवं गंगा स्नान तो की पर मन नहीं लगा। बहू ने कहा कि क्यों माँ ? मैंने तो आपको यह कह कर भेजा था कि आप इधर की चिंता मत करना मैं अपने आप संभाल लूँगी। 


सास ने कहा कि बहू गंगा स्नान करते करते पहले तो मेरा ध्यान घर में रखी अलमारी की तरफ गया और ज्योंही स्नान कर रही थी कि मेरे हाथ से अँगूठी निकल कर गंगाजी में गिर गई। अब तूँ ही बता बाकी यात्रा में मन कैसे लगता। इतनी बात बता ही रही थी कि बहू उठकर अपनी अलमारी में से वह अँगूठी निकाल सास के हाथ में रख कर कहा की माँ इस अँगूठी की बात कर रही है क्या ? सास ने कहा, हाँ ! यह तेरे पास कहाँ से आई, इसको तो मैं पहन कर गई थी और मेरी अंगुली से निकल कर गंगाजी में गिरी थी। 


बहू ने जबाब देते हुई कहा कि, माँ जब गंगा स्नान कर रही थी तो मेरे मन में आया कि देखो माँ कितनी पुण्यवान है जो आज गंगा स्नान हेतु गई। मेरा कैसा अशुभ कर्म आड़े आ रहा था जो मैं नहीं जा सकी। इतना सब सोचने के बाद मैंने विचार किया कि क्यों न मैं यही पर कठौती में पानी डाल कर उसको ही गंगा समझकर गंगा स्नान कर लूँ। जैसे ही मैंने ऐसा किया और कठौती में स्नान करने लगी कि मेरे हाथ में यह अँगूठी आई। मैं देखी यह तो आपकी है और यह यहाँ कैसे आई। इसको तो आप पहन कर गई थी। फिर भी मैं आगे ज्यादा न सोचते हुए इसे सुरक्षित मेरी अलमारी में रख दी। 


सास ने बहू से कहा, बहू में बताती हूँ कि यह तुम्हारी कठौती में कैसे आई। बहू ने कहा, माँ कैसे ? सास ने बताया, बहू देखो *"मन चंगा तो कठौती में गंगा"*। मेरा मन वहाँ पर चंगा नहीं था। मैं वहाँ गई जरूर थी परंतु मेरा ध्यान घर की आलमारी में अटका हुआ था... और मन ही मन विचार कर रही थी कि अलमारी खुली छोडकर आई हूँ कहीं बहू ने आलमारी से मेरे सारे गहने निकाल लिए तो। तो बता ऐसे बुरे विचार मन में आए तो मन कहाँ से लगने वाला और अँगूठी जो मेरे हाथ से निकल कर गिरी वह तेरे शुद्ध भाव होने के कारण तेरी कठौती में निकली। 


*शिक्षा:-*

जीवन में पवित्रता निहायत जरूरी है। वर्तमान में हर प्राणी का मन अपवित्र है, हर व्यक्ति का चित्त अपवित्र है। चित्त और चेतन में काम, क्रोध, मोह, लोभ जैसे विकार इस तरह हावी है कि हम उन्हें समझ नहीं पा रहे हैं। उस विकृति के कारण हमारा जीना बहुत दुर्भर हो रहा है। 


बाहर की गंदगी को हम पसंद नहीं करते, वह दिखती है, तत्क्षण हम उसे दूर करने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारे भीतर में जो गंदगी भरी पड़ी है उस और हमारा ध्यान नहीं जाता है। आज जिस पवित्रता की बात की जाती है, उस पवित्रता का

 आज का प्रेरक प्रसंग*👇👇
*सफलता की तैयारी*
*शहर  से  कुछ  दूर   एक  बुजुर्ग  दम्पत्ती   रहते  थे .  वो  जगह  बिलकुल  शांत  थी  और  आस -पास  इक्का -दुक्का  लोग  ही  नज़र  आते  थे .*
*एक  दिन  भोर  में  उन्होंने  देखा  की  एक  युवक  हाथ  में  फावड़ा  लिए  अपनी  साइकिल  से  कहीं   जा  रहा  है , वह  कुछ  देर  दिखाई  दिया  और  फिर  उनकी  नज़रों  से  ओझल  हो  गया .दम्पत्ती   ने  इस  बात  पर  अधिक  ध्यान  नहीं  दिया , पर  अगले  दिन  फिर  वह  व्यक्ति  उधर  से  जाता  दिखा .अब  तो  मानो  ये  रोज  की  ही  बात  बन  गयी , वह  व्यक्ति  रोज  फावड़ा  लिए  उधर  से  गुजरता  और  थोड़ी  देर  में  आँखों  से  ओझल  हो  जाता .*
 
*दम्पत्ती   इस  सुन्सान  इलाके  में  इस  तरह  किसी  के  रोज  आने -जाने  से  कुछ  परेशान  हो गए  और  उन्होंने  उसका  पीछा  करने   का  फैसला  किया .अगले  दिन  जब  वह  उनके  घर  के  सामने  से  गुजरा  तो  दंपत्ती   भी  अपनी  गाडी  से  उसके  पीछे -पीछे   चलने  लगे . कुछ  दूर  जाने  के  बाद  वह  एक  पेड़  के  पास  रुक  और  अपनी  साइकिल  वहीँ  कड़ी  कर  आगे  बढ़ने  लगा . १५-२० कदम चलने के बाद वह रुका  और अपने  फावड़े  से ज़मीन  खोदने लगा .*
*दम्पत्ती को  ये  बड़ा  अजीब  लगा  और  वे  हिम्मत  कर  उसके  पास  पहुंचे  ,“तुम  यहाँ  इस  वीराने  में   ये  काम  क्यों   कर  रहे  हो ?”*
*युवक  बोला  , “ जी,  दो  दिन  बाद  मुझे  एक  किसान  के  यहाँ  काम  पाने  क  लिए  जाना  है , और  उन्हें  ऐसा  आदमी  चाहिए  जिसे  खेतों  में  काम  करने  का  अनुभव  हो , चूँकि  मैंने  पहले  कभी  खेतों  में  काम  नहीं  किया इसलिए  कुछ  दिनों  से  यहाँ  आकार  खेतों में काम करने की तैयारी कर रहा हूँ!!”*
 *दम्पत्ती  यह  सुनकर  काफी  प्रभावित  हुए  और  उसे  काम  मिल  जाने  का  आशीर्वाद  दिया .*
*शिक्षा :-  किसी  भी  चीज  में  सफलता  पाने  के  लिए  तैयारी  बहुत  ज़रूरी   है . जिस  sincerity के  साथ   युवक  ने  खुद  को  खेतों  में  काम करने  के  लिए  तैयार  किया  कुछ  उसी  तरह  हमें  भी अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए खुद  को  तैयार  करना  चाहिए।*
           *!! असली सौंदर्य !!*
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युवराज भद्रबाहु को अपनी सुंदरता पर बहुत अभिमान था। एक दिन वह महामंत्री के पुत्र सुकेशी के साथ घूमते हुए शमशान पहुंच गए, जहां मुर्दे जल रहे थे। भद्रबाहु ने पूछा- ये लोग यहां पर क्यों एकत्रित हुए हैं?  सुकेशी ने जवाब दिया- मित्रवर इनका एक स्नेही जन मर गया है। ये लोग उसका दाह संस्कार कर रहे हैं। अभिमानी भद्रबाहु ने कहा- लगता है वह कुरूप व्यक्ति रहा होगा तभी ये लोग उसे जला रहे हैं। यदि सुदंर होता तो उसे सहेज कर रखते। सुकेशी ने कहा- युवराज चाहे कितना भी सुंदर क्यों न हो, यदि व्यक्ति प्राण मुक्त हो चुका होता है तो उसे कोई घर में नहीं रखता।
यह सुनते ही भद्रबाहु विचार करने लगा क्या मेरा भी यह हश्र होगा। वह इसी चिंता में घुलने लगा। राजा ने उसकी खिन्नता दूर करने के बहुत प्रयास किए, किंतु वे सफल नहीं हो पाए। अंत में राजा युवराज को गुरु महाआचार्य के पास ले गए। महाआचार्य ने कहा- वत्स यह बताओ जिस भवन में तुम निवास करते हो, वह भवन जीर्ण शीर्ण हो जाए तो उस भवन में तुम रहोगे या दूसरे भवन में जाओगे। भद्रबाहु ने जवाब दिया- गुरुदेव वह भवन तो बदलना ही पड़ेगा। तब महाआचार्य ने कहा- यह शरीर भी भवन के समान है। जब तक वह शरीर नष्ट नहीं होता तब तक आत्मा इसमें रहती है। 
शरीर नाशवान है, इसलिए उदास मत होओ। आत्मा को पहचानो। महाआचार्य की बात सुनकर भद्रबाहु के ज्ञानचक्षु खुल गए।
*शिक्षा:-*
मनुष्य कायिक सौंदर्य के प्रति चिंतित व अभिमान से भरा रहता है जबकि वह नाशवान है। हमेशा आत्मा को सुदंर बनाने की चिंता करनी चाहिए।

 


   !! *सत्य का साथ कभी न छोड़े* !!

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स्वामी विवेकानंद जी प्रारंभ से ही मेधावी छात्र थे और सभी लोग उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित रहते थे | जब वह अपने साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो कर उन्हें सुनते थे | एक दिन कक्षा में वो कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे, सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे की उन्हें पता ही नहीं चला की कब मास्टर जी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया | मास्टर जी ने अभी पढ़ाना शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी | “कौन बात कर रहा है ?” मास्टर जी ने तेज आवाज़ में पूछा |


सभी छात्रों ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ़ इशारा कर दिया | मास्टर जी क्रोधित हो गए | उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबंधित प्रश्न पूछने लगे | जब कोई भी उत्तर नहीं दे पाया तब मास्टर जी ने स्वामी जी से वही प्रश्न किया, स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हो | उन्होनें आसानी से उस प्रश्न का उत्तर दे दिया | यह देख कर मास्टर जी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बात – चीत कर रहे थे |


फिर क्या था | उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी | सभी छात्र एक एक कर बेंच पर खड़े होने लगे | स्वामी जी ने भी यही किया | मास्टर जी बोले नरेन्द्र तुम बैठ जाओ ! नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था | स्वामी जी ने आग्रह किया | सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए |



*कहानी से सीख* :-  

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हों | सदा सत्य का साथ देना चाहिए |

 


               *!! कर्म-भाग्य !!*

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एक चाट वाला था। जब भी चाट खाने जाओ ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता। कई बार उसे कहा कि भाई देर हो जाती है जल्दी चाट लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नहीं होती।


एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।


तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलॉसफ़ी देख ही लेते हैं। मैंने एक सवाल उछाल दिया।


मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से? और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।


कहने लगा, आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा? उसकी चाभियाँ ही इस सवाल का जवाब है। हर लॉकर की दो चाभियाँ होती हैं। एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास। आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली भाग्य। जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नहीं खुल सकता।


आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान। आप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे। कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्य वाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये।


 


                *!! कर्मों का खेल !!*

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एक बार एक गरीब लकड़हारा सूखी लकडि़यों की तलाश में जंगल में भटक रहा था। साथ में बोझा ढोने के लिये उसका गधा भी था। लकडि़याँ बटोरते-बटोरते उसे पता ही नहीं चला कि दिन कब ढल गया। शाम का अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा था लेकिन वह अपने गाँव से बहुत दूर निकल आया था और उधर मौसम भी बिगड़ रहा था। ऐसे में वापस गाँव पहुँचना सम्भव न था, इसलिये वह उस जंगल में आसरा ढूंढने लगा। अचानक उसे एक साधु की कुटिया नजर आई। वह खुशी-खुशी अपने गधे के साथ वहाँ जा पहुँचा और रात काटने के लिये साधु से जगह माँगी। साधु ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया और सोने की जगह के साथ भोजन- पानी की व्यवस्था भी कर दी। वह लकड़हारा सोने की तैयारी करने लगा लेकिन तभी एक और समस्या खड़ी हो गई। दरअसल उसने काफी ज्यादा लकड़ी इकट्ठा कर ली थी और उसे बाँधने के लिये उसने सारी रस्सी इस्तेमाल कर ली थी। यहाँ तक कि अब उसके पास गधे को बाँधने के लिये भी रस्सी नहीं बची थी। उसकी परेशानी देखकर वह साधु उसके पास आये और उसे एक बड़ी रोचक युक्ति बताई। उन्होंने कहा कि गधे को बाँधने के लिये रस्सी की कोई जरूरत नहीं, बस उसके पैरों के पास बैठकर रोज की तरह बाँधने का क्रम पूरा कर लो। इस झूठ-मूठ के दिखावे को गधा समझ नहीं पायेगा और सोचेगा कि उसे बाँध दिया गया है। फिर वह कहीं जाने के लिये पैर नहीं उठायेगा। लकड़हारे ने और कोई चारा न देखकर घबराते-सकुचाते साधु की बात मान ली और गधे को बाँधने का दिखावा करके भगवान से उसकी रक्षा की प्रार्थना करता हुआ सो गया।


रात बीती, सुबह हुई, मौसम भी साफ हो गया। जंगल में पशु-पक्षियों की हलचल शुरू हो गई। आहट से लकड़हारे की नींद खुल गई। जागते ही उसे गधे की चिन्ता हुई और वह उसे देखने के लिये बाहर भागा। देखा तो गधा बिल्कुल वहीं खड़ा था जहाँ रात उसने छोड़ा था। लकड़हारा बड़ा खुश हुआ और साधु को धन्यवाद करके अपने गधे को साथ लेकर जाने लगा लेकिन यह क्याॽ गधा तो अपनी जगह से हिलने को तैयार ही नहीं। लकड़हारे ने बड़ा जोर लगाया, डाँटा-डपटा भी लेकिन गधा तो जैसे अपनी जगह पर जमा हुआ था। उसकी मुश्किल देखकर साधु ने आवाज लगाकर कहा- अरे भई, गधे को खोल तो लो। लकड़हारा रात की बात भूल चुका था, बोला- महाराज, रस्सी तो बाँधी ही नहीं फिर खोलूं क्याॽ


साधु बोले- रस्सी छोड़ो, बन्धन खोलो जो रात को डाले थे। जैसे बाँधने का दिखावा किया था वैसे ही खोलने का भी करना पड़ेगा। उलझन में पड़े लकड़हारे ने सुस्त हाथों से रस्सी खोलने का दिखावा किया और गधा तो साथ ही चल पड़ा। आश्चर्यचकित लकड़हारे को समझाते हुये साधु ने कहा- कर्म तो कर्म हैं चाहे वह स्थूल हों या सूक्ष्म। हम भले ही अपने कर्मों को भूल जायें पर उनका फल तो सामने आता ही है और फिर उसका भुगतान करने के लिये, उसे काटने के लिये नया कर्म करना पड़ता है। वहाँ कोई मनमर्जी या जोर-जबर्दस्ती नहीं चलती।


कर्म मात्र में ही मनुष्य का अधिकार है कर्मानुसार फल तो प्रकृति स्वयं ही जुटा देती है किन्तु फल की प्राप्ति पुन: कर्म की प्रेरणा देती है। अत: एक प्राणी का कर्तव्य है कि प्रत्येक कर्म विचार पूर्वक तथा जिम्मेदारी के साथ करे। कर्म के रहस्य को समझ कर ही हम सुखी हो सकते हैं अन्यथा पग-पग पर हमें उलझन का ही सामना करना पड़ेगा!


      !! *पांच मिनिट* !!

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एक व्यक्ति को रस्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका। यमराज ने पीने के लिए व्यक्ति से पानी माँगा, बिना एक क्षण गवाए उसने पानी पिला दिया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ | यह कहकर यमराज ने एक डायरी देकर उस आदमी से कहा कि तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है | इसमें तुम जो भी लिखोगे वही हो जाएगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट |


उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो उसने देखा कि पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लॉटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है | उसने वहां लिख दिया कि उसके पड़ोसी की लॉटरी न निकले | अगले पेज पर लिखा था कि उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है, तो उसने लिख दिया कि उसका दोस्त चुनाव हार जाए | 


इस तरह, वह पेज पलटता रहा और, अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया | जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पेन उठाया यमराज ने उस व्यक्ति के हाथ से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा पांच मिनट का समय पूरा हुआ , अब कुछ नहीं हो सकता | तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में व्यतीत दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया | अंतत: तुम्हारा अंत निश्चित है | यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा मौका उसके हाथ से निकल चुका था |



*शिक्षा* – 

यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचे, और न ही बुरा करें | दूसरों का भला करने वाला सदा सुखा रहता है और, ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है |


 


               *!! बहुमत का सत्य !!*

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एक साधु वर्तमान शासन तंत्र की आलोचना कर रहे थे, तब एक तार्किक ने उनसे पूछा- कल तो आप संगठन शक्ति की महत्ता बता रहे थे, आज शासन की बुराई! शासन भी तो एक संगठन ही है।


 इस पर महात्मा ने एक कहानी सुनाई- एक वृक्ष पर उल्लू बैठा था, उसी पर आकर एक हंस भी बैठ गया और स्वाभाविक रूप में बोला- आज सूर्य प्रचंड रूप से चमक रहा है, इससे गरमी तीव्र हो गई है। उल्लू ने कहा सूर्य कहाँ है, गरमी तो अंधकार बढ़ने से होती है, जो इस समय भी हो रहा है। उल्लू की आवाज सुनकर एक बड़े वटवृक्ष पर बैठे अनेक उल्लू वहाँ आकर हंस को मूर्ख बताने लगे और सूर्य के अस्तित्व को स्वीकार न कर हंस पर झपटे। हंस यह कहता हुआ उड़ गया कि यहाँ तुम्हारा बहुमत है, बहुमत में समझदार को सत्य के प्रतिपादन में सफलता मिलना दुष्कर ही है।


 तार्किक संगठन और बहुमत के अंतर को समझकर चुप हो गया।


 *👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*


                  *!! पानी की बून्द !!*

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एक राजा जंगल में प्यास से व्याकुल हुआ, तो एक वृक्ष की डाली से पानी की बून्द गिर रही थी। राजा ने पत्तों का दोना बनाकर उन बूंदों से दोने को भरने लगा। जब दोना भर गया तो एक तोते ने दोने को गिरा दिया। राजा ने दूसरी बार दोना भरा तो फिर तोते ने गिरा दिया पर तीसरी बार राजा ने दोना गिराने पर तोते को चाबुक से मार दिया।


उसके बाद राजा उस डाली के पास गया, जहां से पानी टपक रहा था तो राजा के पाँवो की जमीन खिसक गई, वहाँ एक भयंकर अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी, राजा जिसको पानी समझ रहा था वह अजगर की जहरीली लार थी। राजा के मन में पश्चात्ताप का समन्दर उठने लगता है। हे प्रभु! मैंने यह क्या कर दिया, जो पक्षी बार-बार मुझे जहर पीने से बचा रहा था, भ्रम वश मैंने उसे ही मार दिया। 


संगत का असर जी, आपके साथ जो होता है उसमें हमारा भला छुपा होता है लेकिन हम उस पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

   !! मकड़ी, चींटी और जाला !!
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मकड़ी (Spider)अपना जाला बनाने के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में थी. वह चाहती थी कि उसका जाला ऐसे स्थान पर हो, जहाँ ढेर सारे कीड़े-मकोड़े और मक्खियाँ आकर फंसे. इस तरह वह मज़े से खाते-पीते और आराम करते अपना जीवन बिताना चाहती थी. उसे एक घर के कमरे का कोना पसंद आ गया और वह वहाँ जाला बनाने की तैयारी करने लगी. उसने जाला बुनना शुरू ही किया था कि वहाँ से गुजर रही एक बिल्ली उसे देख जोर-जोर से हँसने लगी. मकड़ी ने जब बिल्ली से उसके हंसने का कारण पूछा, तो बिल्ली बोली, ”मैं तुम्हारी बेवकूफ़ी पर हँस रही हूँ. तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता कि ये स्थान कितना साफ़-सुथरा है।
यहाँ न कीड़े-मकोड़े हैं, न ही मक्खियाँ. तुम्हारे जाले में कौन फंसेगा?” बिल्ली की बात सुनकर मकड़ी ने कमरे के उस कोने में जाला बनाने का विचार त्याग दिया और दूसरे स्थान की तलाश करने लगी. उसने घर के बरामदे से लगी एक खिड़की देखी और वह वहाँ जाला बुनने लगी. उसने आधा जाला बुनकर तैयार कर लिया था, तभी एक चिड़िया वहाँ आई और उसका मज़ाक उड़ाने लगी, “अरे, तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है क्या, जो इस खिड़की पर जाला बुन रही हो. तेज हवा चलेगी और तुम्हारा जाला उड़ जायेगा.।
मकड़ी को चिड़िया की बात सही लगी. उसने तुरंत खिड़की पर जाला बुनना बंद किया और दूसरा स्थान ढूंढने लगी। ढूंढते-ढूंढते उसकी नज़र एक पुरानी अलमारी पर पड़ी. उस अलमारी का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था. वह वहाँ जाकर जाला बुनने लगी. तभी एक कॉकरोच वहाँ आया और उसे समझाइश देते हुए बोला, “इस स्थान पर जाला बनाना व्यर्थ है. यह अलमारी बहुत पुरानी हो चुकी है. कुछ ही दिनों में इसे बेच दिया जायेगा. तुम्हारी सारी मेहनत बेकार चली जायेगी.” मकड़ी ने कॉकरोच की समझाइश मान ली और अलमारी में जाला बनाना बंद कर दूसरे स्थान की ख़ोज करने लगी. लेकिन इन सबके बीच पूरा दिन निकल चुका था।
वह थक गई थी और भूख-प्यास से उसका हाल बेहाल हो चुका था. अब उसमें इतनी हिम्मत नहीं रह गई थी कि वह जाला बना सके. थक-हार कर वह एक स्थान पर बैठ गई. वहीं एक चींटी भी बैठी हुई थी. थकी-हारी मकड़ी को देख चींटी बोली, “मैं तुम्हें सुबह से देख रही हूँ. तुम जाला बुनना शुरू करती हो और दूसरों की बातों में आकर उसे अधूरा छोड़ देती हो. जो दूसरों की बातों में आता है, उसका तुम्हारे जैसा ही हाल होता है.” चींटी बात सुनकर मकड़ी को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह पछताने लगी।
सीख:– 
अक्सर ऐसा होता है कि हम नया काम शुरू करते हैं और नकारात्मक मानसिकता के लोग आकर हमें हतोत्साहित करने लगते हैं. वे भविष्य की परेशानियाँ और समस्यायें गिनाकर हमारा हौसला तोड़ने की कोशिश करते हैं. कई बार हम उनकी बातों में आकर अपना काम उस स्थिति में छोड़ देते हैं, जब वह पूरा होने की कगार पर होता है और बाद में समय निकल जाने पर हम पछताते रह जाते हैं. आवश्यकता है कि जब भी हम कोई नया काम शुरू करें, तो पूर्ण सोच-विचार कर करें और उसके बाद आत्मविश्वास और दृढ़-निश्चय के साथ उस काम में जुट जायें. काम अवश्य पूरा होगा. जीवन में सफलता प्राप्त करनी है, तो लक्ष्य के प्रति ऐसा ही दृष्टिकोण रखना होगा।

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 *आज का प्रेरक प्रसङ्ग*
       !! *बेईमान दूधवाला* !!
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एक गाँव में एक दूधवाला रहता है. उसके पास 4 गायें थी, जिनका दूध निकाल कर वह शहर जाकर बेचा करता था. शहर जाने के लिए दूधवाले को गाँव की नदी पार करनी पड़ती थी. वह नाव से नदी पार कर शहर जाता था और अपने ग्राहकों को दूध बेचकर नाव से ही वापस गाँव आ जाता था. दूधवाला एक बेईमान व्यक्ति था. नदी पार करते समय वह रोज़ दूध में नदी का पानी मिला देता और पानी मिला दूध अपने ग्राहकों को बेचा करता था. इस तरह वह बहुत मुनाफ़ा कमाया करता था।
एक दिन ग्राहकों से दूध के पैसे इकठ्ठे कर दूधवाला शहर के बाज़ार चला गया. कुछ ही दिनों में उसके बेटे का विवाह था. उसने बाज़ार से ढेर सारे कीमती कपड़े, गहनें और आवश्यक सामग्रियाँ ख़रीदी. ख़रीददारी करते-करते उसे शाम हो गई. शाम को सारा सामान लेकर वह गाँव लौटने के लिए नाव से नदी पार करने लगा. नाव में लदे सामान का भार अधिक था, जिसे नाव झेल नहीं पाई और असंतुलित होकर पलट गई. दूधवाले ने जैसे-तैसे अपनी जान बचा ली।
किंतु कीमती सामानों को नहीं बचा पाया. सारा सामान नदी की तेज धार में बह गया. कीमती सामान से हाथ धो देने के बाद दूधवाला दु:खी हो गया और नदी किनारे बैठकर जोर-जोर से विलाप करने लगा. तभी नदी से एक आवाज़ आई, “रोते क्यों हो भाई? तुमने वही गंवाया है, जो धोखा देकर कमाया था. दूध में पानी मिलाकर जो तुमने कमाया, वो पानी में ही चला गया. अब रोना बंद करो. ये तुम्हारी बेईमानी का फ़ल था.”

*सीख* :- 
अपने काम में सदा ईमानदारी रखे. बेईमानी से कमाया हुआ धन कभी नहीं टिकता।
   *!!   एक नियम...   !!*
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रात के ढाई बजा था, एक सेठ को नींद नहीं आ रही थी। वह घर में चक्कर पर चक्कर लगाये जा रहा था, पर चैन नहीं पड़ रहा था। आखिर थक कर नीचे उतर आया और कार निकाली।
शहर की सड़कों पर निकल गया। रास्ते में एक मंदिर दिखा, सोचा थोड़ी देर इस मंदिर में जाकर भगवान के पास बैठता हूँ। प्रार्थना करता हूं तो शायद शांति मिल जाये।
वह सेठ मंदिर के अंदर गया तो देखा, एक दूसरा आदमी पहले से ही भगवान की मूर्ति के सामने बैठा था। मगर उसका उदास चेहरा आंखों में करूणा दर्शा रही थी। सेठ ने पूछा "क्यों भाई इतनी रात को मन्दिर में क्या कर रहे हो ?"
आदमी ने कहा "मेरी पत्नी अस्पताल में है, सुबह यदि उसका आपरेशन नहीं हुआ तो वह मर जायेगी और मेरे पास आपरेशन के लिए पैसा नहीं है।
उसकी बात सुनकर सेठ ने जेब में जितने रूपए थे, वह उस आदमी को दे दिए। अब गरीब आदमी के चहरे पर चमक आ गईं थीं। सेठ ने अपना कार्ड दिया और कहा इसमें फोन नम्बर और पता भी है और जरूरत हो तो नि:संकोच बताना।
उस गरीब आदमी ने कार्ड वापिस दे दिया और कहा, "मेरे पास उसका पता है" इस पते की जरूरत नहीं है सेठजी।
आश्चर्य से सेठ ने कहा "किसका पता है भाई" उस गरीब आदमी ने कहा, "जिसने रात को ढाई बजे आपको यहां भेजा उसका।"
इतने अटूट विश्वास से सारे कार्य पूर्ण हो जाते हैं। घर से जब भी बाहर जाये, तो घर में विराजमान अपने प्रभु से जरूर मिलकर जाएं और जब लौट कर आएं तो उनसे जरूर मिलें। क्योंकि, उनको भी आपके घर लौटने का इंतजार रहता है।
"घर" में यह नियम बनाइए कि जब भी आप घर से बाहर निकलें, तो घर में मंदिर के पास दो घड़ी खड़े रह कर "प्रभु चलिए... आपको साथ में रहना हैं।" ऐसा बोल कर ही निकलें; क्यूँकि आप भले ही "लाखों की घड़ी" हाथ में क्यूँ ना पहने हो, पर "समय" तो "प्रभु के ही हाथ" में है..!!
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
 
           *!! चिड़ियाघर का ऊंट !!*
एक ऊंटनी और उसका बच्चा एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे. बच्चे ने पूछा, “माँ, हम ऊँटों का ये कूबड़ क्यों निकला रहता है?”
“बेटा हम लोग रेगिस्तान के जानवर हैं, ऐसी जगहों पर खाना-पानी कम होता है, इसलिए भगवान ने हमें अधिक से अधिक फैट स्टोर करने के लिए ये कूबड़ दिया है. जब भी हमें खाना या पानी नहीं मिलता हम इसमें मौजूद फैट का इस्तेमाल कर खुद को जिंदा रख सकते हैं” ऊंटनी ने उत्तर दिया.
बच्चा कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, “अच्छा, हमारे पैर लम्बे और पंजे गोल क्यों हैं?”
“इस तरह का आकार हम ऊँटों को रेत में आराम से लम्बी दूरी तय करने में मदद करता है, इसलिए” माँ ने समझाया.
बच्चा फिर कुछ देर सोचता रहा और बोला, “अच्छा माँ ये बताओ कि हमारी पलकें इतनी घनी और लम्बी क्यों होती हैं?”
*“ताकि जब तेज हवाओं के कारण रेत उड़े तो वो हमारी आँखों के अन्दर ना जा सके” माँ मुस्कुराते हुए बोली.*
*बच्चा थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला, “अच्छा तो ये कूबड़ फैट स्टोर करने के लिए है… लम्बे पैर रेगिस्तान में तेजी से बिना थके चलने के लिए है… पलकें रेत से बचाने के लिए है… लेकिन तब हम इस चिड़ियाघर में क्या कर रहे हैं?”*
*शिक्षा:-*
*दोस्तों, यही सवाल हमें खुद से पूछना चाहिए. ईश्वर ने हर एक इंसान को विशेष बनाया है. हर व्यक्ति में इतनी क्षमता है कि वह कुछ बड़ा… कुछ महान कर सकता है. लेकिन ज्यादातर लोग चिड़ियाघर का ऊंट बन जाते हैं… अपने अन्दर मौजूद अपार योग्यताओं का प्रयोग ही नहीं करते… बेजुबान जानवर तो मजबूर हैं… लेकिन एक इंसान होने के नाते हमें मजबूर नहीं मजबूत बनाना चाहिए और अपने अन्दर के गुणों को पहचान कर अपना सुंदर जीवन जीने की हर कोशिश करनी चाहिए.*

 


                 *!! सच्चा प्रेम !!*            

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एक बार एक ग्वालन दूध बेच रही थी और सबको दूध नाप नाप कर दे रही थी। उसी समय एक नौजवान दूध लेने आया तो ग्वालन ने बिना नापे ही उस नौजवान का बरतन दूध से भर दिया।


वही थोड़ी दूर पर एक साधु हाथ में माला लेकर मनको को गिन गिन कर माल फेर रहा था। तभी उसकी नजर ग्वालन पर पड़ी और उसने ये सब देखा और पास ही बैठे व्यक्ति से सारी बात बताकर इसका कारण पूछा।

उस व्यक्ति ने बताया कि जिस नौजवान को उस ग्वालन ने बिना नाप के दूध दिया है वह उस नौजवान से प्रेम करती है, इसलिए उसने उसे बिना नाप के दूध दे दिया।


यह बात साधु के दिल को छू गयी और उसने सोचा कि एक दूध बेचने वाली ग्वालन जिससे प्रेम करती है तो उसका हिसाब नहीं रखती और मैं अपने जिस ईश्वर से प्रेम करता हूँ, उसके लिए सुबह से शाम तक मनके गिन गिन कर माला फेरता हूँ। मुझसे तो अच्छी यह ग्वालन ही है और उसने माला तोड़़कर फेंक दी।


*शिक्षा:-*

जीवन भी ऐसा ही है। जहाँ प्रेम होता है वहाँ हिसाब किताब नहीं होता है, और जहाँ हिसाब किताब होता है वहाँ प्रेम नहीं होता है, सिर्फ व्यापार होता है।


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

 👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*
                 *!! बुद्धिमान साधू !!*
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किसी राजमहल के द्वारा पर एक साधु आया और द्वारपाल से बोला कि भीतर जाकर राजा से कहे कि उनका भाई आया है।
द्वारपाल ने समझा कि शायद ये कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई हो जो संन्यास लेकर साधुओं की तरह रह रहा हो!
सूचना मिलने पर राजा मुस्कुराया और साधु को भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया।
साधु ने पूछा – कहो अनुज*, क्या हाल-चाल हैं तुम्हारे?
“मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं भैया?”, राजा बोला।
साधु ने कहा- जिस महल में मैं रहता था, वह पुराना और जर्जर हो गया है। कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे 32 नौकर थे वे भी एक-एक करके चले गए। पाँचों रानियाँ भी वृद्ध हो गयीं और अब उनसे कोई काम नहीं होता…
यह सुनकर राजा ने साधु को 10 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया।
साधु ने 10 सोने के सिक्के कम बताए।
तब राजा ने कहा, इस बार राज्य में सूखा पड़ा है, आप इतने से ही संतोष कर लें।
साधु बोला- मेरे साथ सात समंदर पार चलो वहां सोने की खदाने हैं। मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा… मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।
अब राजा ने साधु को 100 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया।
साधु के जाने के बाद मंत्रियों ने आश्चर्य से पूछा, “ क्षमा करियेगा राजन, लकिन जहाँ तक हम जानते हैं आपका कोई बड़ा भाई नहीं है, फिर आपने इस ठग को इतना इनाम क्यों दिया?”
राजन ने समझाया, “ देखो,  भाग्य के दो पहलु होते हैं। राजा और रंक। इस नाते उसने मुझे भाई कहा।
जर्जर महल से उसका आशय उसके बूढ़े शरीर से था… 32 नौकर उसके दांत थे और 5 वृद्ध रानियाँ, उसकी 5 इन्द्रियां हैं।
समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल में उसके पैर रखते ही मेरा राजकोष सूख गया…क्योंकि मैं उसे मात्र दस  सिक्के दे रहा था जबकि मेरी हैसियत उसे सोने से तौल देने की है। इसीलिए उसकी बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर मैंने उसे सौ सिक्के दिए और कल से मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूँगा।
*शिक्षा:-*
मित्रों, इस प्रसंग से हमें ये सीख मिलती है कि किसी व्यक्ति के बाहरी रंग रूप से उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता इसलिए हमें सिर्फ किसी ने खराब कपडे पहने हैं या वो देखने में अच्छा नहीं है; उसके बारे में गलत विचार नहीं बनाने चाहियें।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
 *👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*
              *!! मालिक कौन !!*
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एक आदमी एक गाय को घर की ओर ले जा रहा था। गाय जाना नहीं चाहती थी। वह आदमी लाख प्रयास कर रहा था, पर गाय टस से मस नहीं हो रही थी। ऐसे ही बहुत समय बीत गया।
एक संत यह सारा माजरा देख रहे थे। अब संत तो संत हैं, उनकी दृष्टि अलग ही होती है, तभी तो दुनिया वाले उनकी बातें सुन कर अपना सिर ही खुजलाते रह जाते हैं।
संत अचानक ही ठहाका लगाकर हंस पड़े। वह आदमी कुछ तो पहले ही खीज रहा था, संत की हंसी उसे तीर की तरह लगी। वह बोला- "तुम्हें बड़ी हंसी आ रही है?"
संत ने कहा- "भाई! मैं तुम पर नहीं हंस रहा। अपने ऊपर हंस रहा हूँ।" अपना झोला हाथ में उठा कर संत ने कहा- "मैं यह सोच रहा हूँ कि मैं इस झोले का मालिक हूँ, या यह झोला मेरा मालिक है?"
वह आदमी बोला- "इसमें सोचने की क्या बात है? झोला तुम्हारा है, तो तुम इसके मालिक हो। जैसे ये गाय मेरी है, मैं इसका मालिक हूँ।"
संत ने कहा- "नहीं भाई! ये झोला मेरा मालिक है, मैं तो इसका गुलाम हूँ। इसे मेरी जरूरत नहीं है, मुझे इसकी जरूरत है। तुम गाय की रस्सी छोड़ दो। तब मालूम पड़ेगा कि कौन किसका मालिक है? जो जिसके पीछे गया, वो उसका गुलाम।" इतना कहकर संत ने अपना झोला नीचे गिरा दिया और जोर जोर से हंसते हुए चलते बने।
सन्त  कहते हैं कि हम भी अपने को बहुत सी वस्तुओं और व्यक्तियों का मालिक समझते हैं, पर वास्तव में हम उनके मालिक नहीं, गुलाम हैं। मालिक वे हैं। क्योंकि उनकी आवश्यकता हमें है। 
जो जितनी रस्सियाँ पकड़े हैं, वो उतना ही गुलाम है। जिसने सभी रस्सियाँ छोड़ दी हैं, जिसे किसी से कुछ भी अपेक्षा न रही, वही असली मालिक है।
*शिक्षा:-*
इसलिए अपना जीवन उसके भरोसे रखिए जो सबका मालिक है...
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
 ★ 🎂जन्म दिवस विशेष :-
    !! भारत की प्रथम महिला शिक्षिका – सावित्रीबाई फुले !!
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सावित्रीबाई फुले भारत की एक समाज-सुधारिका एवं मराठी कवयित्री थीं। उन्होने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्रियों के अधिकारों एवं शिक्षा के लिए बहुत से कार्य किए। सावित्रीबाई भारत के प्रथम कन्या विद्यालय में प्रथम महिला शिक्षिका थीं। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत माना जाता है। 1852 में उन्होने अछूत बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की थी।
परिचय -
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महात्मा ज्योतिबा को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। उनको महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। 
ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछात मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।
‘सामाजिक मुश्किलें
वे स्कूल जाती थीं, तो लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से 160 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था कितनी सामाजिक मुश्किलों से खोला गया होगा देश में एक अकेला बालिका विद्यालय।
महानायिका
सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।
विद्यालय की स्थापना
1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे शहर में।
निधन
10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया। और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।

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           *!!   यह संसार क्या है?   !!*

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एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है?' इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई। 'एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दु:खी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।


कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'


कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा, 'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दु:ख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

 🛑Best Motivational Quotes🛑*

✅जब भी रास्ते में मुसीबतें आए तो घबराना मत। नदी की तरह अपने रास्ते से सब कुछ हटाते हुए अपनी मंजिल की तरफ बढ़ जाना।
✅अभी तक मिली असफलताओं से निराश ना हो, दुगुने उत्साह से लगे रहो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।
✅तम अभी तक अपनी असली औकात नही जानते, वरना ऐसे न बैठे रहते।
✅अपने सपनो को पाने के लिए आपमे एक ज़िद होनी चाहिए। केवल फॉर्मेलिटी करने से कुछ नही होने वाला।

✅अगर अभी आप पर दुनिया वाले हंसते हैं, तो चिंता मत कीजिये। जिस दिन आप सफल हो गए, या तो वे आपके आगे पीछे घूमेंगे या फिर कभी शक्ल नही दिखाएंगे।
✅आप खुद में दृढ़ विश्वास करे, अच्छा महसूस करे और कड़ी मेहनत करते रहे, यही रहस्य है किस्मत के दरवाजे को खोलने का।
✅बड़ा सोचो, बड़े सपने देखो, लेकिन शुरुआत छोटे से ही करनी होती हैं।
✅य शिकायते मत करो कि तुम्हारे पास फलाना नही हैं, ढिमका नही हैं। अपने मौजूदा संशाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल करो और बेहतरीन आउटपुट दो।
✅अगर वाकई में तुमको कामयाब होना हैं तो अपने बीते कल में जीना छोड़ दो।
✅बहाने बनाने से आप दूसरों को नही, खुद को मूर्ख बना रहे हो।
✅आपकी जिंदगी एक फ़िल्म की तरह है। इसके लिए एक शानदार कहानी लिखो, इसे फ्लॉप मत होने दो।
✅आपको नदी की तरह बहते रहना होगा, रुक गए तो सड़ जाओगे।
✅अपनी तुलना किसी से मत करो, आप अपने आप मे नायाब हो, बेशकीमती हो।
✅एक जहाज किनारे पर सबसे ज्यादा सुरक्षित होता हैं। लेकिन ये इसके लिए तो नही बना हैं। इसलिए अपना कंफर्ट जोन आज ही छोड़ दो।
✅अपनी ज़िंदगी की सारी हदें आपने खुद बनाई हैं। इन हदो को तोड़ने के बाद आप कामयाब हो जाओगे।
 
Ⓜ️अपनी ज़िंदगी की सारी हदें आपने खुद बनाई हैं। इन हदो को तोड़ने के बाद आप कामयाब हो जाओगे।
Ⓜ️एक दिन आपका सारा जीवन आपकी आंखों के सामने से होकर गुजरेगा। सुनिश्चित करें कि यह देखने लायक हो।
Ⓜ️यह आपकी सोच ही है जो आपको राजा भी बना सकती हैं और रंक भी बना सकती हैं। इसलिए अपनी सोच बदलो जिंदगी बदलो।
Ⓜ️गलती होने के डर से कुछ भी ना करना सबसे बड़ी गलती हैं।
Ⓜ️लगातार प्रैक्टिस, आपको उस काम मे महान बना देगी।
Ⓜ️खद को इतना काबिल बना दो कि कामयाबी आपके पास आने के लिये मजबूर हो जाये।
Ⓜ️जयादा सोचने से बचो क्योकि ये आपको अंदर ही अंदर खोखला कर देगा।
Ⓜ️अपने शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाओ, क्योकि पुरी जिंदगी आपको इसी के साथ रहना हैं।
Ⓜ️खद को शांत कर लो, आपमे गजब की शक्ति आ जायेगी।
Ⓜ️आप जो कुछ भी बनना चाहते हो, वो बनने के लिए कभी भी देर नही होती हैं।
Ⓜ️आपमे अपनी खुद की दुनिया बनाने का सामर्थ्य हैं। आप असंभव को भी सम्भव बना सकते हो।
Ⓜ️जब भी रास्ते में मुसीबतें आए तो घबराना मत। नदी की तरह अपने रास्ते से सब कुछ हटाते हुए अपनी मंजिल की तरफ बढ़ जाना।
Ⓜ️अभी तक मिली असफलताओं से निराश ना हो, दुगुने उत्साह से लगे रहो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।
Ⓜ️ तम अभी तक अपनी असली औकात नही जानते, वरना ऐसे न बैठे रहते।
Ⓜ️ अभी आप पर दुनिया वाले हंसते हैं, तो चिंता मत कीजिये। जिस दिन आप सफल हो गए, या तो वे आपके आगे पीछे घूमेंगे या फिर कभी शक्ल नही दिखाएंगे।
Ⓜ️आप खुद में दृढ़ विश्वास करे, अच्छा महसूस करे और कड़ी मेहनत करते रहे, यही रहस्य है किस्मत के दरवाजे को खोलने का।
 🔰परेरणादायी  मोटिवेशनल कोट्स फॉर स्टूडेंट्स🔰*
🔰शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं।
सुझाव :  किसी भी विषय को मज़ेदार बनाने के लिए उसके प्रायोगिक उपयोग को समझे | 
🔰शिक्षा भविष्य का पासपोर्ट है कल का उन लोगों के लिए  जो आज इसकी तैयारी करते हैं 
सुझाव : पड़ने  के लिए बैठने से पहले क्रिस्टल क्लियर प्लान बनाएं।
🔰तम जहां हो वहीं से  शुरू करो। जो तुम्हारे पास है, उसका उपयोग करो। जो तुम कर सकतो हो वो करो
सुझाव :  आलस्य के कारण कल पर अपनी पढ़ाई  को  न टाले | 
🔰शरू करने के लिए आपको महान नहीं होना चाहिए, लेकिन शुरू करके आपको महान बनना होगा। 

सुझाव :   अपने बड़े लक्ष्य को छोटे लक्ष्यों में विभाजित करें।
🔰शरुआत करने का तरीका है कि आप बात करना छोड़ दें और करना शुरू करें
सुझाव :   एक समय में एक चीज पर ध्यान दें। 
🔰आज से एक साल बाद आप कामना कर सकते हैं कि  काश आप आज ही शुरू हो गए होते

सुझाव :   समय बहुत कीमती है। इसकी कद्र करे
🔰मरी सलाह है, कल कभी मत करो जो तुम आज  कर सकते हो। प्रोक्रिस्टिनेशन समय का चोर है। पकड़ो इसे
सुझाव :   कल करे सो आज कर , आज करे सो अभी
🔰यदि आप उड़ नहीं सकते, तो दौड़े। अगर आप दौड़ नहीं सकते, तो चलिए। यदि आप नहीं चल सकते हैं, तो रेंगे   , लेकिन आप जो भी करे ..आगे बढ़ते रहे
सुझाव :   रोज़  कम से कम 1 घंटा ज़रूर पड़े
🔰मने सुना और मै भुल गया । मैंने देखा और मुझे याद है। जब मै करता हूं,तब मैं समझता हूं। 

सुझाव :   दोहराना सीखने की कुंजी है। 
सफलता सकारात्मक सोच के साथ आपकी सकारात्मक कार्रवाई से मिलती है।   

सुझाव :   केवल सोचने से कुछ नहीं होता है आपको कुछ करना होगा| 
हमें हार नहीं माननी चाहिए और हमें समस्या को हमें हराने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। 

सुझाव :   जब तक तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं 
🔰यदि आप इसे सरलता से नहीं समझा सकते , तो आप इसे अच्छी तरह से समझे नहीं है  

सुझाव :   अपनी सीख को दूसरों के साथ बांटे 
शिक्षक दरवाजा खोलते हैं, लेकिन आपको प्रवेश खुद करना होता है 

सुझाव :   खुद पढ़ाई करे, यह बहुत ज़रूरी है 
बीता हुए कल  से सीखो। आज के लिए जियो। आने वाले कल की आशा करो 
सुझाव :   अपनी असफलताओं से सीखें। 
🔰सीखने की खूबसूरत बात यह है कि कोई भी इसे आपसे दूर नहीं कर सकता है। 

सुझाव :   आप अपने भविष्य के लिए पढ़ाई कर रहे हैं। 

🔰अपने बहाने की तुलना में मजबूत हो।

सुझाव :   अपने मन को नियंत्रित करना सीखें।  
🔰तयारी सफलता की कुंजी है। 
सुझाव :   अपने अध्ययन के लिए एक समय सारणी बनाएं। 
🔰सफलता बार-बार और दिन-प्रतिदिन के छोटे प्रयासों का योग है
सुझाव :  दिन के अंत में अपने पूरे दिन का विश्लेषण करें।
🔰यह हमेशा असंभव सा लगता है जब तक कि पूरा न हो जाय
सुझाव :   शीशे के सामने खड़े होकर बोले मै टॉपर  हूँ 
🔰जानना पर्याप्त नहीं है; हम लागू करना चाहिए। कामना पर्याप्त नहीं है; हमें करना चाहिए 
सुझाव :   जो कुछ भी आप सीखते हैं, उसे  कागज पर व्यक्त करें।
🔰असफलता मुझे कभी भी पछाड़ नहीं पाएगी यदि सफल होने का मेरा संकल्प काफी मजबूत है 
सुझाव :   खुद के प्रति वचनबद्ध रहें
 *आज का प्रेरक प्रसङ्ग*
          *!! मन !!*
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सुबह होते  ही, एक भिखारी नरेन्द्रसिंह के घर पर भिक्षा मांगने के लिए पहुँच गया।  भिखारी ने  दरवाजा खटखटाया, नरेन्द्रसिंह बाहर आये पर उनकी जेब में देने के लिए कुछ न निकला।  वे कुछ दु:खी होकर घर के अंदर गए और एक बर्तन उठाकर भिखारी को दे दिया। भिखारी के जाने के थोड़ी देर बाद ही वहां नरेन्द्रसिंह की पत्नी आई और बर्तन न पाकर चिल्लाने लगी- “अरे! क्या कर दिया आपने चांदी का बर्तन भिखारी को दे दिया।  दौड़ो-दौड़ो और उसे वापिस लेकर आओ।”
नरेन्द्रसिंह दौड़ते हुए गए और भिखारी को रोककर कहा- “भाई मेरी पत्नी ने मुझे जानकारी दी है कि यह गिलास चांदी का है, कृपया इसे सस्ते में मत बेच दीजियेगा। ”वहीँ पर खड़े नरेन्द्रसिंह के एक मित्र ने उससे पूछा- मित्र! जब आपको  पता चल गया था कि ये गिलास चांदी का है तो भी उसे गिलास क्यों ले जाने दिया?” नरेन्द्रसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा- “मन को इस बात का अभ्यस्त बनाने के लिए कि वह बड़ी से बड़ी हानि में भी कभी दुखी और निराश न हो!”
शिक्षा– मन को कभी भी निराश न होने दें, बड़ी से बड़ी हानि में भी प्रसन्न रहें।  मन उदास हो गया तो आपके कार्य करने की गति धीमी हो जाएगी। इसलिए मन को हमेशा प्रसन्न रखने का प्रयास करें।

 *आज का प्रेरक प्रसङ्ग*


    *!! मदद का जज्बा : सीख सुहानी !!*

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मैं ऑफिस बस से ही आती जाती हूँ। ये मेरी दिनचर्या का हिस्‍सा है। उस दिन भी बस काफी देर से आई, लगभग आधे-पौने घंटे बाद। खड़े-खड़े पैर दुखने लगे थे। पर चलो शुक्र था कि बस मिल गई। देर से आने के कारण भी और पहले से ही बस काफी भरी हुई थी। बस में चढ़कर मैंने चारों तरु नजर दौड़ाई पाया कि सभी सीटें भर चुकी थी। उम्‍मीद की कोई किरण नजर नहीं आई। तभी एक मजदूरन ने मुझे आवाज लगाकर अपनी सीट देते हुए कहा ‘मेडम आप यहां बैठ जाइए’। मैंने उसे धन्‍यवाद देते हुए उस सीट पर बैठकर राहत की सांस ली। 


वो महिला मेरे साथ बस स्‍टॉप पर खड़ी थी तब मैंने उस पर ध्‍यान नहीं दिया था। कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, तो मैंने उसे बैठने का इशारा किया। तब उसने एक महिला को उस सीट पर बिठा दिया जिसकी गोद में एक छोटा बच्‍चा था वो मजदूरन भीड़ की धक्‍का-मुक्‍की सहते हुए एक पोल को पकड़कर खड़ी थी। थोड़ी देर बाद बच्‍चे वाली औरत अपने गन्‍तव्‍य पर उतर गई। इस बार वही सीट एक बुजुर्ग को दे दी, जो लम्‍बे समय से बस में खड़े थे।


मुझे आश्‍चर्य हुआ कि हम दिन-रात बस की सीट के लिए लड़ते हैं और ये सीट मिलती है और दूसरे को दे देती है। कुछ देर बाद वो बुजुर्ग भी अपने स्‍टॉप पर उजर गए, तब वो सीट पर बैठी। मुझसे रहा नहीं गया, तो उससे पूछ बैठी, ‘तुम्‍हें तो सीट मिल गई थी एक या दो बार नहीं, बल्कि तीन बार, फिर भी तुमने सीट क्‍यों छोड़ी? तुम दिन भर ईंट-गारा ढोती हो, आराम की जरूरत तो तुम्‍हें भी होगी, फिर क्‍यों नहीं बैठी ?’ मेरी इस बात का जो जवाब उसने दिया उसकी उम्‍मीद मैंने कभी नहीं की थी। उसने कहा ‘मैं भी थकती हूँ। आप से पहले स्‍टॉप पर खड़ी थी, मेरे भी पैरों में दर्द होने लगा था। 


जब मैं बस में चढ़ी थी तब यही सीट खाली थी। मैंने देखा आपके पैरों में तकलीफ होने के कारण आप धीरे-धीरे बस में चढ़ी। ऐसे में आप कैसे खड़ी रहतीं इसलिए मैंने अपको सीट दी। उस बच्‍चे वाली महिला को सीट इसलिए दी उसकी गोद में छोटा बच्‍चा था जो बहुत देर से रो रहा था। उसने सीट पर बैठते ही सुकून महसूस किया। बुजुर्ग के खड़े रहते मैं कैसे बैठती, सो उन्‍हें दे दी। मैंने उन्‍हें सीट देकर ढेरो आशीर्वाद पाए। कुछ देर का सफर है मैडम जी, सीट के लिए क्‍या लड़ना। वैसे भी सीट को बस में ही छोड़ कर जाना है, घर तो नहीं ले जाना ना। 


मैं ठहरी ईंट-गारा ढोने वाली, मेरे पास क्‍या है, न दान करने लायक धन है, कोई पुण्‍य कमाने लायक करने के लिए। रास्‍ते से कचरा हटा देती हूँ, रास्‍ते के पत्‍थर बटोर देती हूँ, कभी कोई पौधा लगा देती हूँ। यहां बस में अपनी सीट दे देती हूँ। यही है मेरे पास, यही करना मुझे आता है।’ वो तो मुस्‍करा कर चली गई पर मुझे आत्‍ममंथन करने को मजबूर कर गई। मुझे उसकी बातों से एक सीख मिली कि हम बड़ा कुछ नहीं कर सकते तो समाज में एक छोटा सा, नगण्‍य दिखने वाला कार्य तो कर ही सकते हैं। मुझे लगा ये मजदूर महिला उन लोगों के लिए सबह है जो अपना रूतबा दिखाने, अपनी प्रतिष्‍ठा का प्रदर्शन करने और आयकर बचाने के लिए अपनी काली कमाई को दान के नाम पर खपाते हैं, या फिर वो लोग जिनके पास पर्याप्‍त पैसा होते हुए भी ग़रीबी का रोना रोते हैं। 


हम समाज सेवा के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं परन्‍तु इन छोटी-छोटी बातों पर कभी ध्‍यान नहीं देते। मैंने मन ही मन उस महिला को नमन किया तथा उससे सीख ली यदि हमें समाज के लिए कुछ करना हो, तो वो दिखावे के लिए न किया जाए बल्कि खुद की संतुष्टि के लिए हो।


 👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*
                 *!! परम संतोषी !!*
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एक बहुत विद्वान संत थे। वे कहीं भी ज्यादा दिन नहीं रहते थे, पैदल ही एक शहर से दूसरे शहर जाकर लोगों को प्रवचन दिया करते थे। लोग भी उन्हें बहुत मानते थे और सम्मान करते थे। 
एक बार संत पैदल ही दूसरे शहर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक सोने का सिक्का मिला। महात्मा ने उसे उठा लिया और अपने पास रख लिया। उन्होंने सोचा कि ये सिक्का मैं सबसे गरीब इंसान को ही दूंगा।
संत कई दिनों तक ऐसे किसी इंसान की तलाश करते रहे, जो बहुत गरीब हो। लेकिन उन्हें ऐसा कोई व्यक्ति नजर नहीं आया। इस तरह कुछ समय और बीत गया। संत भी वो बात भूल गए।
एक दिन संत ने देखा कि एक राजा अपनी सेना सहित दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा है। तभी साधु को सोने के सिक्के की याद आई। उन्होंने वो सिक्का निकाला और राजा के ऊपर फेंक दिया।
संत को ऐसी हरकत करते देख राजा नाराज भी हुआ और आश्चर्यचकित भी। राजा ने संत से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि- राजा, कुछ समय पहले ये सोने का सिक्का मुझे रास्ते से मिला था। मैं इसे सबसे गरीब इंसान को देना चाहता था। लेकिन मुझे अभी तक कोई गरीब मनुष्य नहीं दिखाई दिया। आज जब मैंने तुम्हें देखा तो लगा कि तुम ही सबसे गरीब मनुष्य हो।
राजा ने संत से पूछा कि- आपको ऐसा क्यों लगा, क्योंकि मैं तो राजा हूं। मेरे पास तो अकूत धन-संपत्ति है। संत ने कहा- इतना धन होने के बाद भी तुम दूसरे राज्य पर अधिकार करना चाह रहे हो। वो भी सिर्फ उस राज्य का धन पाने के लिए तो तुमसे बड़ा गरीब और कौन हो सकता है। राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और वो अपनी सेना लेकर अपने देश लौट गया।
*शिक्षा:-*
कभी किसी दूसरे के धन पर नजर नहीं रखनी चाहिए। हमेशा अपनी मेहनत से कमाए गए धन में ही संतोष करना चाहिए। इस दुनिया में संतोषी व्यक्ति ही सबसे सुखी है। संतोषी व्यक्ति को अपने पास जो साधन होते हैं, वे ही पर्याप्त लगते हैं।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

 *आज का प्रेरक प्रसङ्ग*


   !! *भगवान सबको देखता हैं* !!

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एक बार एक गाँव में एक भला आदमी बिक्री से दुखी था| यह देख एक चोर को उस पर दया आ गई| वह उस बेरोजगार आदमी के पास गया और बोला, “मेरे साथ चलो, चोरी में बहुत सारा धन मिलेगा” आदमी बैकर बैठे-बैठे परेशान हो गया था| इसलिए वह उस चोर के साथ चोरी करने को तैयार हो गया| लेकिन अब समस्या यह थी की उसे चोरी करना आती नहीं थी| उसने साथी से कहा, “मुझे चोरी करना आती तो नहीं है, फिर कैसे करूँगा|” चोर ने कहा” तुम उसकी चिंता मत करो, मैं तुम्हें सब सिखा दूंगा”


अगले दिन दोनों रात के अँधेरे में गाँव से दूर एक किसान का पका हुआ खेत काटने पहुँच गए| वह खेत गाँव से दूर जंगल में था, इसीलिए वहां रात में कोई रखवाली के लिए आता जाता न था| लेकिन फिर भी सुरक्षा के लिहाज़ से उसने अपने नए साथी को खेत की मुंडेर पर रखवाली के लिए खड़ा कर दिया और किसी के आने पर आवाज लगाने को कहकर खुद खेत में फसल चोरी करने पहुँच गया| नए साथी ने थोड़ी ही देर में अपने साथी को आवाज लगे, “भर जल्दी उठो, यहाँ से भाग चलो…खेत का मालिक पास ही खड़ा देख रहा है” चोर ने जैसे ही अपने साथी की बात सुनी वह फसल काटना छोड़ उठकर भागने लगा|


कुछ दूर जाकर दोनों खड़े हुए तो चोर ने साथी से पुछा, “मालिक कहाँ खड़ा था? कैसे देख रहा था? नए चोर ने सहजता पूर्वः जवाब दिया, “मित्र! इश्वर हर जगह मौजूद है| इस संसार में जो कुछ भी है उसी का है और वह सब कुछ देख रहा है| मेरी आत्मा ने कहा, इश्वर यह भी मौजूद है और हमें चोरी करते हुए देख रहा है…इस स्थती में हमारा भागना ही उचित था| पहले चोर पर बेरोजगार आदमी की बातों का इतना प्रभाव पड़ा की उसने चोरी करना ही छोड़ दिया|

 👇👇 आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇*
                  *!! बकरी चोर !!*
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एक बार एक किसान ने बाज़ार से एक बकरी ख़रीद लीं और उसे काँधे पर लेकर वो खेतों से चलते चलते घर जाने लगा। तभी तीन चोरों की नज़र उस पर पड़ी। बकरी चुराने के लिए उन्होंने एक तरकीब लगायीं।
पहले पहला चोर किसान के पास गया और बोला, “अरे आप तो बहुत दयालु हैं। इस कुत्ते को काँधे पर लेकर जा रहें हो।” किसान ने हँसी में उसे टाल दिया।
थोड़ी देर बाद दूसरा चोर किसान के पास गया और उसने पूछा, “आप इस कुत्ते को काँधे पर क्यों ले जा रहे हो?” किसान के मन में अब थोडी शंका उत्पन्न हुई।
थोड़ी देर बाद तीसरा चोर उसे मिला, “यह कुत्ता बीमार है क्या? आप इसे काँधे पर उठा कर क्यों ले जा रहे हो?” अब तो किसान डर गया। यहाँ तो कुछ गड़बड़ है। इस कुत्ते ने ज़रूर ही बकरी का रूप लिया है। ये सोचकर उसने बकरी वहीं फेंक दी और दौड़ते हुए घर वापस गया। इस तरह तीनों चोरों ने बड़ीं चालाकी से बकरी चुरा ली।
*शिक्षा:-*
हमारे आस पास भी कितने बकरी चोर नज़र आते हैं। उनके फ़ायदे के लिए हमें भटकाने वाले कभी वो आपके बॉस की निंदा करेंगे, कभी अपने काम के बारे में बुरा भला कहेंगे, कभी आप को ग़लत सलाह देंगे, कभी आपके दोस्तों के बारे में ग़लत बतायेंगे। आख़िर आपका खुद पर अटूट विश्वास ही आपको सफल बनाता है ।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*